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पहचान

    पार्टी में बहुत चहल पहल थी , जो होना लाजिमी   भी है   क्योंकि शहर के सबसे अमीर किशनदास के बेटे की शादी जो थी। पार्टी में एक से एक बड़े   नामचीन लोग जो या तो खुद बड़े    धनाढ्य   थे या अपने विधा में महारत हासिल लोग। और इस पार्टी में उन   बड़े लोगो की पत्नियां भी थी जो जगह जगह एक ग्रुप में बातचीत कर रही थी। मुद्दा किसी का मेकअप , किसी का हेयर स्टाइल , किसी का चरित्र चित्रण ; या किसी की व्यक्तिगत जिंदगी के बारे में टीका टिप्पणी। तभी उन महिलाओं की नज़र पार्टी में अभी-अभी आये एक मेहमान पर पड़ जाती है। उनमे से शायद एक ने उसे पहचाना ," अरे यह तो शिवानी है जो हमारे साथ कॉलेज में थी   पर यह यहाँ कैसे? " उसका कौतुहल बढ़ गया और वह खुद मेहमान के पास पहुंची और उसे याद दिलाया कि वह उनकी   कॉलेज में थी। . उस महिला ने मुस्कराते हुए कहा "हाँ मुझे याद है और ख़ुशी भी कि इतने सालों बाद भी तुम लोगों ने मुझे पहचान   लिया। बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ा “तुम्हारे पति न...

रिश्ते का बोझ

  एक लड़की जब १५ - १६ वर्ष के बीच होती है , तभी से घरवालों , पास पड़ोस की नजरो में सयानी   हो जाती है। जमाना कितना भी आधुनिक क्यों न हो लड़कियों के लिया कुछ मानक आज भी लगभग वैसे ही है। और अगर २५ के अंदर तक शादी न हुई तो उम्र ही ख़त्म मान ली जाती है। इस चक्कर में जो भी , जैसा भी , चलता है , और लड़की को अनचाहे   रिश्ते का बोझ ढोने के लिए विवश किया जाता है। ऐसा ही कुछ शुचि के साथ भी हुआ था.लेकिन उसके आत्मबल ने उसे बचा लिया। उम्र ३० पार हो गयी   थी। पारिवारिक जिम्मेदारियाँ और अच्छे लड़के की चाहत में पता ही नहीं चला. अचानक से किसी ने एक दिन एक लड़के के बारे में बताया। इंजीनियर था, यह सुनकर घर में ख़ुशी की लहर दौड़ गयी। शुचि ने स्वयं से यह स्पष्ट किया कि दहेज में एक रुपये की भी उम्मीद न करें। जैसे तैसे खींचतान के बात आगे बढ़ी और सगाई तक बात आयी तो शुचि ने लड़के को देखा भी नहीं था। शुचि सामने से एक बार मिलना चाहती थी पर मौसा जी   फोटो दिखा कर बोले "लड़का इंजीनियर है , अब क्या देखना? बस आते ही सग...

अब और नहीं

    वैसे तो बरसात का मौसम मुझे बहुत पसंद हैं। पर उस रात की बरसात कुछ अजीब सी थी। बहार बूंदों का शोर और मन में अजीब सी तन्हाई न चाहते हुए भी कुछ बीते   लम्हे , कोई चेहरा बार बार   सामने आ रहा था। बड़ी मुश्किल से तो निजात पाई थी।   मैंने खुद को   उस झंझावात से बाहर निकाला था   फिर आज अचानक से आज ये सब एकदम से सामने क्यों आ रहा था? खुद को समझाते हुए या यूँ कहे कि खुद से लड़ते हुए कब आँख लगी , पता ही नहीं चला। रात के तीन बज रहे थे , अचानक से मेरा मोबाइल बज उठा।   वैसे तो मेरा फ़ोन हमेशा साइलेंट ही रहता है रात मे।   लेकिन उस दिन शायद उधेड़बुन में भूल गई। मोबाइल दो बार बज के बंद हो चूका था। तीसरी बार में नींद खुली, बाहर   अभी भी जोरदार बारिश हो रही थी। आँखे मलते हुए मोबाइल देखा , मोबाइल स्क्रीन पर जो नंबर आ रहा था वह देखकर नींद जैसे गायब से हो गई, और एक एक घटना आँखों के सामने आने लगी। इतने शिद्दत से चाहा था मैंने उसे बिना किसी उम्मीद के प्यार किया निस्वार...

बड़े दिलवाला

 बड़े दिलवाला 'भैया दो किलो आटा देना ', "जी बहन जी " कहते  हुए जब भोला ने सामने से चेहरा  देखा तो चौंक पड़ा "अरे बिटिया आज तुम क्यों चली आई हो?   सामान लेने के लिए घर का नौकर कहा चला गया ?और क्या चाहिए सामान में?  "कुछ नहीं , अभी बस दो किलो आटा ही चाहिए" पारुल ने संकोच से कहा।  भोला को ये सब अजीब सा लगा , पर उसने पारुल को दो किलो आटा दे दिया, पर उसके मन में यह बात खटक रही थी कि हजारों  का बिल बनता था अब अचानक ऐसा क्या हो गया? उसने सोचा बात कुछ जरूर है।  शाम को दुकान बंद करके सीधा पारुल के घर पहुंचा।  अचानक उसे देखकर पारुल चौंक गई और हड़बड़ाते हुए उसने पुछा "आप " '’ अरे बिटिया इधर से गुजर रहा था तो सोचा पिंकी बिटिया से भी मिल लूँ।‘’  तभी पारुल की  बिटिया पिंकी वहां आती है और भोला अंकल से चॉकलेट पाकर खुश हो जाती है। भोला झिझकते हुए पारुल से पूछता है क्या बात है बिटिया सब ठीक तो है ना?  पारुल ने झूठी मुस्कुराहट के साथ कहा " हाँ  चाचा सबठीक है.’’ . बिटिया एक बात पूँछे ? तनिक  संकोच हो रहा है। पर रहा नहीं गया इसलिए पूँछ र...

मैनर्स

 सौभाग्य से मुझे एक बड़े विश्वविद्यालय  के  अतिथि गृह में प्रवास का मौका मिला। खूबसूरत परिसर एक से उच्च शिक्षित प्रोफेसर इन सब का सानिध्य पाकर मैं अभिभूत हो गई। प्रवास का प्रथम दिवस भोजन के लिए मैं भोजन गृह की ओर गई। रात का समय था इसलिए या लोग ज्यादा नहीं आए जो भी वजह  रही  हो वहां मुझे एक टेबल पर केवल तीन महिलाएं दिखाई दी जो साथ में डिनर कर रही थी। मैंने भी चुपचाप प्लेट में खाना लेकर दूसरे टेबल पर खाना शुरु किया। अभी उन महिलाओं की बातचीत सुनाई दी ।बात टेबल मैनर्स से लेकर देश विदेश, विषय से संबंधित सारे ज्ञान, घर परिवार, मोबाइल से वीडियो कॉल सब कुछ एक साथ चल रहा था साथ ही पूरे वातावरण के शांति में साफ-साफ सुनाई दे रही थी उनकी प्लेट, चम्मच और कटोरियों की खटर पटर जो की इतनी ज्यादा थी  जो कानों को अच्छी नहीं लग रही थी। बातों का सिलसिला भी लगातार जारी था जैसे उनकी बातों और प्लेट चम्मच की प्रतियोगिता हो रही थी कि ज्यादा शोर कौन कर सकता है? पर इस प्रतियोगिता में जीता कौन यह तो नहीं बता सकती क्योंकि तब तक मैं खाना खाकर उठ  चुकी थी पर जाते-जाते भी मुझे उनकी आव...

देवी

  चौदह वर्षीय रहीम दौड़ता हुआ सलमा के कमरे में आया। "अम्मा - अम्मा! बाहर पुलिसवाले आये हैं और बड़े साहब है तुम्हारा नाम सबसे पूछ रहे हैं।" सलमा सोचने लगी, वह रंगीन दुनिया तो कब की  छोड़ आयी है। अब तो जवानी भी नहीं बची। मुझे अब यहाँ कौन पूछ रहा है! बीस साल से ज्यादा हो गए....  आखिरी बार रेशमा ही आई थी रहीम को उसे देने के लिए जिससे उसे कोठे की बुरी हवा न लगे।  बच्चे का हाथ पकड़ाकर वह हमेशा के लिए दुनिया से रुखसत  हो गई। तब से लेकर आज तक न सलमा ने कभी उन  गलियों का रुख किया  था न कोई उसके पास आया। अब अचानक से कौन आ गया? इन्ही ख्यालो के उधेड़ बुन में सलमा  को एक आवाज़ ने जैसे नींद से जगा दिया।   "सलमा जी आप ही का नाम है ?" एक तीस वर्षीय युवक पुलिस की वर्दी में पूछ रहा था। सलमा ने घबराते हुए स्वर में कहा.. जी, मै ही सलमा हूँ पर मैंने कुछ नहीं किया।   युवक ने एकदम से उसके पैर छु लिए। सलमा हड़बड़ा गयी कि ये क्या हो रहा है! युवक ने उसे सँभालते हुए कहा, आप उम्र में मेरी माँ जैसी हैं। सुना था, कोठेवाली घर तबाह करती हैं पर अगर आप न होतीं तो आज मे...

हैसियत

                                           अरे तुमने इतने महंगी ड्रेस ख़राब कर दी " मीना जैसे उबल सी गयी थी। जिसमे सबसे ख़राब था तुम्हारी हैसयित भी है इस तरह की ड्रेस खरीदने की , तुम्हारी पांच महीने की तनख्वाह भी कम पड़ जाएगी समझे " वरुन सर झुकाये सब चुप चाप सुन रही था , क्योंकि उसके हाथ से काफी   छूटकर मीना के ड्रेस पर गिर गई थी और वह बस गुस्से में तिलमिला गई थी । सब बोलने के बाद भी उसका दिल ठंडा न हुआ तो उसे जॉब से निकलवाने की धमकी भी दे डाली , जानता नहीं है तू नहीं मै कौन हूं ?   डी. एम. की वाइफ हूँ डी. एम. की यहाँ से तो जाएगा ही , पूरे   शहर   में कही नौकरी नहीं मिलेगी   कैफे के सरे लोग इक्क्ठे हो गए .   कैफे का मालिक भी मीना को शांत करने की कोशिश में था. पर सब नाकामयाब।   कोई समझ   ही नहीं पा रहा था की अब क्या करे , तभी मीना का पति विवेक वहाँ आ गया , वह भीड़ क...