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निवेश

  ​आशुतोष और अभय अच्छे मित्र थे। स्कूल से कॉलेज तक का सफर एक साथ तय किया। आशुतोष के पिता एक समृद्ध व्यापारी थे इसलिए उसके स्नातक होते ही उन्होंने व्यापार की जिम्मेदारी उसे देते हुए कहा, "आज तक मैंने बहुत मेहनत की, एक छोटे से निवेश से इसे यहाँ तक लेकर आया। अब तुम इसे नई ऊँचाई दो।" आशुतोष के पिता की बात मानते हुए कारोबार की सभी जिम्मेदारियाँ अच्छे से उठा लीं और शीघ्र ही एक सफल कारोबारी भी बन गया। बेटे की इस उपलब्धि से पिता का मन बहुत ही हर्षित हो गया। उन्होंने शीघ्र ही एक अच्छी लड़की देखकर अपनी अंतिम जिम्मेदारी से मुक्ति पाते हुए आशुतोष की शादी कर दी। आशुतोष की पत्नी एक बड़े घराने की सुंदर और पढ़ी-लिखी लड़की थी पर अपने रूप और धन का अभिमान था उसमें। आशुतोष सब कुछ होने के बाद भी हंसमुख और सौम्य था। ​अभय अब भी संघर्षशील था क्योंकि कोई सहारा नहीं था कि सभी जिम्मेदारियाँ उसके कंधे पर आ गई थीं  माँ ने बहुत मेहनत से इसे पाला-पोसा था। पिता का साया सिर से बचपन में ही छिन गया था, अब बूढ़ी माँ की एकमात्र उम्मीद अभय ही था। अभय ने मेहनत करते हुए पार्ट-टाइम जॉब और ट्यूशन करते हुए अपनी पढ़ा...

खोटा सिक्का

  ​हरिपुर गाँव के प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक श्री दीनानाथ जी बहुत ही सरल और अपने सच्चे मायनों में शिक्षक थे। हर छात्र उनका अपना ही बेटा या बेटी था। उनकी कोशिश यही रहती थी कि उनका पढ़ाया हर बच्चा भविष्य में कुछ अच्छा करे। स्कूल के अलावा वह घर पर भी बच्चों को मुफ्त में पढ़ाते थे। उनका सबसे प्रिय विद्यार्थी राजीव पढ़ने में बहुत ही होशियार था। ​इस कारण वह मास्टर साहब और उनकी पत्नी दोनों का प्रिय था। चूँकि मास्टर साहब की कोई संतान न थी, तो वह हमेशा राजीव जैसे होनहार बच्चे को अपने बेटे की तरह लाड करते थे। उनकी पत्नी तरह-तरह के व्यंजन उनके लिए बनाती थीं और अपने हाथों से ही उसे खिलाती थीं। ​मास्टर जी की कक्षा में रमेश भी था जो पढ़ने में औसत से भी कम था। समझाने के बावजूद भी वह कम समझता था। मास्टर जी को लगता था कि शायद यह मेहनत नहीं करता, वह उसे हमेशा डाँटते रहते और कहते— "तू मेरी कक्षा का सबसे खोटा सिक्का है, जो नहीं चलेगा। मेहनत कर, नहीं तो सच में खोटा सिक्का बन जाएगा।" ​रमेश चुपचाप मास्टर जी की डाँट सुन लेता और कोशिश करता कि मास्टर जी उससे खुश रहें, पर ऐसा कभी न हुआ। समय धीरे-ध...

अपमान

  ​सौम्या एक हंसमुख, शिक्षित और अध्यापन से प्रेम करने वाली एक स्कूल शिक्षिका थी, जिसकी आँखों में प्रशासनिक अधिकारी बनने का सपना था। सौम्या पढ़ाई के साथ-साथ सिविल सर्विसेज की तैयारी भी कर रही थी। एक दिन उसके घर एक ऐसा रिश्ता आया जिसे कोई मना नहीं कर पाया और करता भी कैसे, क्योंकि ऐसा रिश्ता तो नसीब वालों को ही मिलता है। ​लड़का अमित एक आई.पी.एस. ऑफिसर था और देखने में भी बेहद खूबसूरत। उसके माता-पिता को सौम्या की सादगी भा गई थी। सौम्या इतनी जल्दी विवाह के लिए तैयार नहीं थी, पर लड़का इतना अच्छा था कि उसकी एक न चली और उसका विवाह हो गया। सौम्या ने नई जिंदगी की नियति मानकर खुशी-खुशी अपने नए संसार को अपना लिया, पर उसकी सादगी अभी भी वही थी। ​अमित ने उसे कई बार टोका कि "आई.पी.एस. की बीवी हो, थोड़ा ढंग से रहा करो," पर सौम्या अभी भी अपनी सादगी वाली साड़ी और साधारण मेकअप में ही रहती। अमित का ट्रांसफर दूसरे शहर में हुआ। ऑफिस में उसके सम्मान में एक शानदार पार्टी दी गई। सौम्या ने वहाँ सबका स्वागत किया। तभी किसी ने अमित से कहा, "अरे भाई, भाभी तो बहुत सिंपल हैं, आई.पी.एस. ऑफिसर की बीवी नह...

बड़े लोग

​ "मैम मैं घर जा रही हूँ काम हो गया।" "अच्छा ठीक है"। " रचना कुछ कहना था। "मैम मेरी बेटी बीमार है क्या मुझे 5000 रुपये मिल सकते हैं।" "क्या? अभी 5 दिन हुए तुम्हें काम पर आए और इतना बड़ा एडवांस..." ...एक इंजेक्शन बताया है जो 5000 का है काफी इलाज किया ठीक नहीं हो रहा उन्होंने कहा कि इससे वह ठीक हो जाएगी।" "तुम्हें भी दिमाग है मामूली सा बुखार है किसी सरकारी अस्पताल में दिखा दो ठीक हो जाएगी।" "नहीं मैडम काफी समय हो गया आप एडवांस समझ कर दे दीजिये।" "तुम पागल हो तीन महीने का एडवांस..."..कौन देता है  फालतू देने के लिए इतने पैसे नहीं हैं और अब मेरा दिमाग मत खाओ।" कामवाली रचना अपना मुँह लटकाकर चली गयी। एक दिन बाद जब वह आई तो लतिका ने उससे खुद ही पूछा- "कैसी है तुम्हारी बेटी?" "ठीक है मैडम इंजेक्शन लग गया कुछ और दवा भी दी काफी ठीक हो गयी।" "इंजेक्शन कहाँ से आया? तुम्हारे पास इतने पैसे कहाँ से आये?" "मैडम कुछ बड़े लोगों ने मेरी मदद कर दी।" "अच्छा! कौन बड़े लोग?...

आस्था

  ​आस्था का नाम तो आस्था था पर उसमें ईश्वर में कोई आस्था नहीं थी। ऐसा नहीं कि वह नास्तिक थी पर व्रत त्योहार, पूजा पाठ मंदिर में उसकी कोई रुचि नहीं थी। रुचि थी तो बस कर्म में वह काम को ही पूजा मानती थी। ​माँ हमेशा कहती थी बेटा कर्म में आस्था अच्छी बात है पर थोड़ी आस्था ईश्वर में भी होनी चाहिए। कोई एक ऐसी शक्ति है जो हमें बुराई से बचाती है हमारी मदद करती है पर  आस्था सब  सुनकर अनसुनी कर देती। माँ ने अब कहना ही छोड़ दिया। ​एक दिन ऑफिस में उसकी नाईट शिफ्ट थी। रात में सिर्फ दो लोग ही बचे थे। ड्राइवर बीमार था इसलिए कैब की सुविधा भी नहीं थी। पहले तो आस्था ऑफिस जाने से हिचकिचाई लेकिन फिर उसने सोचा कि ऑटो तो मिल ही जायेगा। ऑफिस काफी दूरी पर था इसलिए वह  खुद की गाड़ी से भी नहीं जा सकती थी। ऑफिस की  शिफ्ट की रात के दो बजे  वह घर के लिए ऑफिस से निकली। हालांकि रास्ता सुनसान था पर आस्था को लगा ऑटो  तो मिल ही जायेगा न उसने किसी को फोन किया न घर वालों को। वह पैदल ही आगे बढ़ने लगी कि  हो सकता है थोड़ी दूर पर सवारी मिल जाय। ​यह उसका पहला अनुभव था जब वह रात में अकेले...

पहला प्यार

 तुम जब भी यहाँ आती हो तो रुक क्यों जाती हो भला? क्या है ऐसा यहाँ?" रीमा की आवाज़ ने जैसे मुझे सपने से जगा दिया। और वह सही भी कह रही थी। मैं जब भी कैंटोनमेंट एरिया से गुज़रती थी, मुझे न जाने क्या हो जाता था। मेरे घर में दूर-दूर तक कोई आर्मी वाला नहीं था, लेकिन आर्मी की यूनिफॉर्म और उनका अनुशासन मुझे खींचता था। वह सभी आर्मी वाले मुझे अपने से लगते थे।उनके प्रति एक अनजाना सा जुड़ाव महसूस करती थी। उनसे जुड़ी कोई भी फिल्म न थी जो मैंने न देखी हो। 26 जनवरी 15 अगस्त की परेड टीवी पर उन्हें देखना मेरा पसंदीदा काम था। एक दिन मेरे सर ने मुझे बताया कि आर्मी स्कूल में कोई वैकेंसी आई है। मैंने न आव देखा न ताव, बस तुरंत ही जाकर फॉर्म अप्लाई कर दिया। एक दिन सर की कॉल आई उन्होंने मुझसे कहा "तुम कहा हो "? मैने कहा " घर पर" " अरे आज तो आर्मी स्कूल का इंटरव्यू है , तुम गई नहीं?" " मुझे तो कोई कॉल नहीं आई" । " सर ने कहा " तुम तुरंत जाओ और वहां पता करो क्या हुआ?" आनन फानन में मैं वहां पहुंची। पहुंचते ही मैने ऑफिस में जाकर पूछा तो ऑफिस इंचार्ज...

पहचान

 स्नेहा एक होनहार छात्रा  होने के साथ-साथ एक कुशल नृत्यांगना भी थी और वह भी बिना किसी गुरु के मोबाइल में नृत्य प्रस्तुतियों को देखकर कभी-कभी टीवी के कार्यक्रमों को देखकर स्वयं की सृजनशीलता ने उसके नृत्य में चार चांद लगा दिया ।स्नेहा पढ़ने में तो होशियार तो थी लेकिन पिता का साया सर से जल्दी उठ जाने के कारण स्नातक स्तर से ही घर की जिम्मेदारियां उसके ऊपर आ गई सभी बहनों की शादी हो गई थी । भाई नहीं था लिया था सब कुछ संभालने की जिम्मेदारी स्नेह के कंधे पर आ गई । पर बिना किसी शिकायत के स्नेहा ने किस्मत के फैसले को मंजूर करते हुए घर और मां को भी संभाल लिया बस एक मन में हमेशा एक कसक रहती उसका नृत्य प्रेम अधूरा रह गया। पढ़ाई घर सब कुछ संभालने में उसके लिए समय ही नहीं मिलता और शौक से घर का खर्च तो चलता नहीं इसलिए उसने शौक और घर में से घर को चुना पर कहते हैं ना पहला प्यार कभी मरता नहीं ।जब कभी वह नृत्य की प्रस्तुति टीवी मोबाइल या किसी कार्यक्रम मैं देखती तो उसके मन में एक टीस जग जाती स्नेहा जिंदा तो थी पर उसकी सांसे नृत्य में ही बसती थी।  एक दिन ऑफिस में एक महिला स्नेहा के सहयो...