मुकद्दर की इबारत
शहर की भागदौड़ से दूर, एक पुराने कमरे की खिड़की पर बैठी वह अक्सर आसमान को देखा करती थी। बचपन की यादें आज फिर उसकी पलकों पर आ ठहरी थीं। उसे याद था वह दौर, जब घर में तंगहाली थी, गरीबी का साया था, लेकिन उसकी आँखों में पढ़ाई-लिखाई करके कुछ बड़ा बनने की एक बेफ़िक्र चमक थी। वह मुश्किलों से डरती नहीं थी, बल्कि अपनी मासूमियत और हँसी से हर दिन को नया बना लेती थी। ग्रेजुएशन का आख़िरी साल था, उम्मीदों के नए पंख निकल ही रहे थे कि नियति ने पहला वार किया। पिता का साया हमेशा के लिए सर से उठ गया। जिस उम्र में लड़कियाँ अपने सपनो को बुनती हैं, उस उम्र में उसके कंधों पर पूरे परिवार का बोझ आ गिरा। लेकिन वह बिखरी नहीं। उसने आँसू पोंछे, छोटी-मोटी नौकरी ढूँढ़ी, परिवार का पालन-पोषण किया और अपनी आगे की पढ़ाई भी जारी रखी। उस भागदौड़ भरी ज़िंदगी में भी उसने जीने का हुनर ढूँढ़ लिया था। उसे घूमना, तस्वीरें खींचना, और दुनिया को कैमरे के लेंस से देखना बहुत पसंद था। वही उसकी छोटी सी आज़ादी थी, वही उसकी अपनी दुनिया थी। पर शायद इम्तिहान अभी बाकी थे। नियति ने फिर एक मोड़ लिया और माँ के साथ हुई एक भयानक दुर...