Posts

बड़े लोग

​ "मैम मैं घर जा रही हूँ काम हो गया।" "अच्छा ठीक है"। " रचना कुछ कहना था। "मैम मेरी बेटी बीमार है क्या मुझे 5000 रुपये मिल सकते हैं।" "क्या? अभी 5 दिन हुए तुम्हें काम पर आए और इतना बड़ा एडवांस..." ...एक इंजेक्शन बताया है जो 5000 का है काफी इलाज किया ठीक नहीं हो रहा उन्होंने कहा कि इससे वह ठीक हो जाएगी।" "तुम्हें भी दिमाग है मामूली सा बुखार है किसी सरकारी अस्पताल में दिखा दो ठीक हो जाएगी।" "नहीं मैडम काफी समय हो गया आप एडवांस समझ कर दे दीजिये।" "तुम पागल हो तीन महीने का एडवांस..."..कौन देता है  फालतू देने के लिए इतने पैसे नहीं हैं और अब मेरा दिमाग मत खाओ।" कामवाली रचना अपना मुँह लटकाकर चली गयी। एक दिन बाद जब वह आई तो लतिका ने उससे खुद ही पूछा- "कैसी है तुम्हारी बेटी?" "ठीक है मैडम इंजेक्शन लग गया कुछ और दवा भी दी काफी ठीक हो गयी।" "इंजेक्शन कहाँ से आया? तुम्हारे पास इतने पैसे कहाँ से आये?" "मैडम कुछ बड़े लोगों ने मेरी मदद कर दी।" "अच्छा! कौन बड़े लोग?...

आस्था

  ​आस्था का नाम तो आस्था था पर उसमें ईश्वर में कोई आस्था नहीं थी। ऐसा नहीं कि वह नास्तिक थी पर व्रत त्योहार, पूजा पाठ मंदिर में उसकी कोई रुचि नहीं थी। रुचि थी तो बस कर्म में वह काम को ही पूजा मानती थी। ​माँ हमेशा कहती थी बेटा कर्म में आस्था अच्छी बात है पर थोड़ी आस्था ईश्वर में भी होनी चाहिए। कोई एक ऐसी शक्ति है जो हमें बुराई से बचाती है हमारी मदद करती है पर  आस्था सब  सुनकर अनसुनी कर देती। माँ ने अब कहना ही छोड़ दिया। ​एक दिन ऑफिस में उसकी नाईट शिफ्ट थी। रात में सिर्फ दो लोग ही बचे थे। ड्राइवर बीमार था इसलिए कैब की सुविधा भी नहीं थी। पहले तो आस्था ऑफिस जाने से हिचकिचाई लेकिन फिर उसने सोचा कि ऑटो तो मिल ही जायेगा। ऑफिस काफी दूरी पर था इसलिए वह  खुद की गाड़ी से भी नहीं जा सकती थी। ऑफिस की  शिफ्ट की रात के दो बजे  वह घर के लिए ऑफिस से निकली। हालांकि रास्ता सुनसान था पर आस्था को लगा ऑटो  तो मिल ही जायेगा न उसने किसी को फोन किया न घर वालों को। वह पैदल ही आगे बढ़ने लगी कि  हो सकता है थोड़ी दूर पर सवारी मिल जाय। ​यह उसका पहला अनुभव था जब वह रात में अकेले...

पहला प्यार

 तुम जब भी यहाँ आती हो तो रुक क्यों जाती हो भला? क्या है ऐसा यहाँ?" रीमा की आवाज़ ने जैसे मुझे सपने से जगा दिया। और वह सही भी कह रही थी। मैं जब भी कैंटोनमेंट एरिया से गुज़रती थी, मुझे न जाने क्या हो जाता था। मेरे घर में दूर-दूर तक कोई आर्मी वाला नहीं था, लेकिन आर्मी की यूनिफॉर्म और उनका अनुशासन मुझे खींचता था। वह सभी आर्मी वाले मुझे अपने से लगते थे।उनके प्रति एक अनजाना सा जुड़ाव महसूस करती थी। उनसे जुड़ी कोई भी फिल्म न थी जो मैंने न देखी हो। 26 जनवरी 15 अगस्त की परेड टीवी पर उन्हें देखना मेरा पसंदीदा काम था। एक दिन मेरे सर ने मुझे बताया कि आर्मी स्कूल में कोई वैकेंसी आई है। मैंने न आव देखा न ताव, बस तुरंत ही जाकर फॉर्म अप्लाई कर दिया। एक दिन सर की कॉल आई उन्होंने मुझसे कहा "तुम कहा हो "? मैने कहा " घर पर" " अरे आज तो आर्मी स्कूल का इंटरव्यू है , तुम गई नहीं?" " मुझे तो कोई कॉल नहीं आई" । " सर ने कहा " तुम तुरंत जाओ और वहां पता करो क्या हुआ?" आनन फानन में मैं वहां पहुंची। पहुंचते ही मैने ऑफिस में जाकर पूछा तो ऑफिस इंचार्ज...

पहचान

 स्नेहा एक होनहार छात्रा  होने के साथ-साथ एक कुशल नृत्यांगना भी थी और वह भी बिना किसी गुरु के मोबाइल में नृत्य प्रस्तुतियों को देखकर कभी-कभी टीवी के कार्यक्रमों को देखकर स्वयं की सृजनशीलता ने उसके नृत्य में चार चांद लगा दिया ।स्नेहा पढ़ने में तो होशियार तो थी लेकिन पिता का साया सर से जल्दी उठ जाने के कारण स्नातक स्तर से ही घर की जिम्मेदारियां उसके ऊपर आ गई सभी बहनों की शादी हो गई थी । भाई नहीं था लिया था सब कुछ संभालने की जिम्मेदारी स्नेह के कंधे पर आ गई । पर बिना किसी शिकायत के स्नेहा ने किस्मत के फैसले को मंजूर करते हुए घर और मां को भी संभाल लिया बस एक मन में हमेशा एक कसक रहती उसका नृत्य प्रेम अधूरा रह गया। पढ़ाई घर सब कुछ संभालने में उसके लिए समय ही नहीं मिलता और शौक से घर का खर्च तो चलता नहीं इसलिए उसने शौक और घर में से घर को चुना पर कहते हैं ना पहला प्यार कभी मरता नहीं ।जब कभी वह नृत्य की प्रस्तुति टीवी मोबाइल या किसी कार्यक्रम मैं देखती तो उसके मन में एक टीस जग जाती स्नेहा जिंदा तो थी पर उसकी सांसे नृत्य में ही बसती थी।  एक दिन ऑफिस में एक महिला स्नेहा के सहयो...

सेवानिवृति

  आज ऑफिस में बहुत चहल पहल थी। कोना कोना शीशे की तरह चमक रहा था और चमकना भी चाहिए था क्योंकि आज ऑफिस के सबसे वरिष्ठ सफाई करनी रमेश जी का रिटायरमेंट था उनके सम्मान में आज ऑफिस में पार्टी रखी गई थी छोटे कर्मचारी से लेकर बड़े साहब तक रमेश जी के मुरीद थे 35 साल की नौकरी में उन्होंने कभी किसी को शिकायत का मौका नहीं दिया ।किसी की छुट्टी हो किसी को जल्दी जाना हो या किसी के हिस्से का काम रमेश जी हर किसी काम कर देते थे। सफाई कर्मी होने के साथ-साथ वह स्नातक भी थे उनके ऑफिस के साहब लोग भी अपना छोटा मोटा काम दे देते थे। कभी न थकने वाले सदैव मुस्कुराने वाले सब के प्रिय रमेश जी का आज अंतिम कार्य दिवस था सभी बड़ी बेसब्री से उनका इंतजार कर रहे थे पर आज तक कभी ऑफिस देर से ना आने वाले रमेश जी आज समय के बाद भी नहीं आए। सभी फोन पर फोन कर रहे थे पर फोन उठ नहीं रहा था । सभी परेशान थे कि आखिर रमेश जी को क्या हुआ? रमेश जी बेमन से तैयार हो रहे थे पर जैसे खुशी छीन सी गई हो 35 साल की नौकरी अब आदत सी बन गए थी और आज वह आदत छूटती सी लग रही थी सब जिस सेवानिवृत्ति का इंतजार करते हैं वह रमेश जी के लिए बोझ ...

बेटी

 कहा जाता है कि बेटियां लक्ष्मी रूप होती है और जिस घर में बेटियां लक्ष्मी रूप होती हैं और जिस घर में बेटियां होती हैं वह घर सौभाग्यशाली होता है पर आज भी कहीं ना कहींलोगों के मन मे बेटों की चाह रहती ही है पर मेरा मन सदा ही बेटियों को  चाहता था। पर मुझे एक बेटी का पिता बनने का सौभाग्य प्राप्त न हो सका।  दो बेटे दोनों पढ़ लिखकर अपनी अपनी दुनिया में खुश थे घर में बच्चे बस में और मेरी श्रीमती जी। सरकारी नौकरी से रिटायरमेंट के बाद  पेंशन से घर अच्छी तरह चल जाता था पर अकेलापन काटने को दौड़ता था इसलिए एक मेडिकल  स्टोर खोल दिया था सारा दिन उसमें रहता था  शाम को किसी  बगीचे में टहलकर  आता था कोई कमी नहीं थी  बस बेटी की कमी खलती थी।  एक शाम मेडिकल स्टोर पर एक बिटिया दवा की पर्ची लेकर आई और बोली " अंकल यह दवाई दे दीजिए और पूरा बता दीजिए कितने पैसे देने हैं"। मैंने उसकी ओर देखा। फिर पर्चे को देखा काफी दवाईयां थी और महंगी भी। मैंने बोला " बेटा कुल मिलाकर ₹3000 हुए ।कोई हॉस्पिटल में भर्ती है क्या " "जी मेरी मम्मी का ऑपरेशन हुआ है उन्हीं की   ...

धन्यवाद

 "डॉक्टर साहब मेरे पापा को बचा लीजिए प्लीज डॉक्टर साहब थोड़ा सा समय दीजिए एक बार देख लीजिए उनको"आरुषि ने लगभग रोते हुए कहा ।श्रीकांत ने नर्स से पूछा "क्या केस है इनका" "सर उनके पिता का एक्सीडेंट हो गया है गंभीर चोट आई है अगर सर्जरी 1 घंटे में नहीं की गई तो उनका बचना मुश्किल है" "तो क्या समस्या है? सर्जरी की तैयारी करिए" श्रीकांत ने कहा। " सर उनके पास पैसे नहीं है फीस के फिर कैसे?" आरुषि ने हाथ जोड़कर कहा " सर प्लीज आप ऑपरेशन कर दीजिए एक या दो दिन में मैं आपके पैसे दे जाऊंगी नहीं तो आप छुट्टी नहीं करिएगा अभी मेरे पास बस यह एक सोने की अंगूठी है वह आप ले लीजिए प्लीज मेरा भरोसा करिए" " देखिए फीस हॉस्पिटल में जमा करना होता है मुझे नहीं मैं कैसे यह कर सकता हूं?" सर प्लीज आप कुछ करिए आपकी मदद भी तो कभी किसी ने की होगी" उसने याचना भरे स्वर में कहा श्रीकांत जैसे अचानक से यादों में खो जाते हैं फिर कहते हैं "चलिए देखते हैं क्या मामला है? मैं क्या कर सकता हूं ?श्रीकांत आरुषि के साथ उसके पिता को देखने वार्ड में...