हैसियत
अरे तुमने इतने महंगी
ड्रेस ख़राब कर दी " मीना जैसे उबल सी गयी थी। जिसमे सबसे ख़राब था तुम्हारी
हैसयित भी है इस तरह की ड्रेस खरीदने की, तुम्हारी पांच महीने की तनख्वाह भी कम पड़ जाएगी
समझे " वरुन सर झुकाये सब चुप चाप सुन रही था, क्योंकि उसके हाथ से काफी छूटकर मीना के
ड्रेस पर गिर गई थी और वह बस
गुस्से में तिलमिला गई थी । सब बोलने के बाद भी उसका दिल ठंडा न हुआ तो उसे जॉब से
निकलवाने की धमकी भी दे डाली, जानता नहीं है तू नहीं मै कौन हूं? डी. एम. की वाइफ
हूँ डी. एम. की यहाँ से तो जाएगा ही , पूरे
शहर में कही नौकरी नहीं मिलेगी
कैफे के सरे लोग इक्क्ठे
हो गए. कैफे का मालिक भी मीना को शांत करने की कोशिश
में था. पर सब नाकामयाब। कोई समझ ही नहीं पा रहा था की अब क्या करे , तभी मीना का पति विवेक वहाँ आ गया , वह भीड़ को देखकर कुछ समझ
पाता , तभी उसकी नजर
वरुन पर पड़ी और उसने आश्चर्य से पुछा , अरे वरुन तू यहाँ कैसे , इतने दिनों से तू कहाँ था कितना ढूंढा पर तेरी कोई ख़बर ही
नहीं , मैंने कॉलेज के बाद फिर पर कही तेरा कही पता ही
नहीं व चला वह एक साँस में बोल
गया।
भीड़ में हलचल मच चुकी थी।
लोग कानाफूसी कर रहे थे। मीना हैरान , उसने अचरज भरे स्वर में
कहा विवेक तुम इसे जानते हो? विवेक ने कहा
“अरे यही तो है जिसके वजह
से मै आज मैं जो भी हूँ , बन पाया”। वरुन ने उसे टोकने की कोशिश की पर विवेक ने बताया
कि कैसे कॉलेज के दिनों में पढाई से लेकर फ़ीस तक में वरुण ने उसकी मदद की।
मीना को समझ नहीं आ रहा था कि अब वह क्या करे?, तभी विवेक बोल पड़ा अरे बातों बातों में मैं यह तो पूछना ही भूल गया इतनी भीड़ क्यों इक्क्ठी है और तुम गुस्से में क्यों लग रही थी ? मीना ने न चाहते हुए सारी घटना बताई। जिस पर विवेक ने नाराजगी जाहिर करते हुए मीना से कहा की वह वरुन से माफ़ी माँगे। वरुन के मना करने पर वह बोला " दोस्त आज तुम न होते तो मैं नहीं होता , पर यह बताओ कि यह वेटर की नौकरी क्यों कर रहे हो ? तुम तो पढ़ने में इतने होशियार थे। वरुन ने बताया कि कालेज के बाद पिताजी के बिज़नेस में घाटा होने के बाद बीमार रहने लगे। और मां का भी स्वर्गवास हो गया। बहनो की फिक्र में मजबूरी में उसे जो मिला उसे करना पड़ा। विवके ने मीना से कहा तुमने अब तक माफ़ी नहीं मांगी ? मीना संकुचाते हुए बोली , इतना गलत बर्ताव किया मैंने इनके साथ अब किस मुँह से माफ़ी मांगू? मैंने तो इनकी हैसियत तक देख डाली "वरुन यदि हो सके तो मुझे माफ़ कर दीजियेगा "
वरुन ने मुस्कराते हुए
कहा " भाभी कोई बात नहीं गलती मेरी भी थी”।
विवेक ने कहा की वह उनको अच्छी नौकरी दिला देगा पर वरुन ने विनम्रता से कहा दोस्त आज तुमने आज मुझे पहचान कर
ही दोस्ती का इनाम दे दिया अब किसी और बात के जरूरत नहीं। अभी संघर्ष है पर एक दिन
मुकाम पर जरूर पहुँचूँगा। बस तुम्हरी शुभ कामनाये साथ रहे कहते हुए वरुन वापस काम पर लग गया।
भीड़ भी छंट गयी पर हर एक के मन में यही सवाल था की असली हैसियत किसकी
है?
मंजरी तिवारी
७५२३८६१९७८
Manjaritiwari2009@gmail.com
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