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Showing posts from April, 2026

अपमान

  ​सौम्या एक हंसमुख, शिक्षित और अध्यापन से प्रेम करने वाली एक स्कूल शिक्षिका थी, जिसकी आँखों में प्रशासनिक अधिकारी बनने का सपना था। सौम्या पढ़ाई के साथ-साथ सिविल सर्विसेज की तैयारी भी कर रही थी। एक दिन उसके घर एक ऐसा रिश्ता आया जिसे कोई मना नहीं कर पाया और करता भी कैसे, क्योंकि ऐसा रिश्ता तो नसीब वालों को ही मिलता है। ​लड़का अमित एक आई.पी.एस. ऑफिसर था और देखने में भी बेहद खूबसूरत। उसके माता-पिता को सौम्या की सादगी भा गई थी। सौम्या इतनी जल्दी विवाह के लिए तैयार नहीं थी, पर लड़का इतना अच्छा था कि उसकी एक न चली और उसका विवाह हो गया। सौम्या ने नई जिंदगी की नियति मानकर खुशी-खुशी अपने नए संसार को अपना लिया, पर उसकी सादगी अभी भी वही थी। ​अमित ने उसे कई बार टोका कि "आई.पी.एस. की बीवी हो, थोड़ा ढंग से रहा करो," पर सौम्या अभी भी अपनी सादगी वाली साड़ी और साधारण मेकअप में ही रहती। अमित का ट्रांसफर दूसरे शहर में हुआ। ऑफिस में उसके सम्मान में एक शानदार पार्टी दी गई। सौम्या ने वहाँ सबका स्वागत किया। तभी किसी ने अमित से कहा, "अरे भाई, भाभी तो बहुत सिंपल हैं, आई.पी.एस. ऑफिसर की बीवी नह...

बड़े लोग

​ "मैम मैं घर जा रही हूँ काम हो गया।" "अच्छा ठीक है"। " रचना कुछ कहना था। "मैम मेरी बेटी बीमार है क्या मुझे 5000 रुपये मिल सकते हैं।" "क्या? अभी 5 दिन हुए तुम्हें काम पर आए और इतना बड़ा एडवांस..." ...एक इंजेक्शन बताया है जो 5000 का है काफी इलाज किया ठीक नहीं हो रहा उन्होंने कहा कि इससे वह ठीक हो जाएगी।" "तुम्हें भी दिमाग है मामूली सा बुखार है किसी सरकारी अस्पताल में दिखा दो ठीक हो जाएगी।" "नहीं मैडम काफी समय हो गया आप एडवांस समझ कर दे दीजिये।" "तुम पागल हो तीन महीने का एडवांस..."..कौन देता है  फालतू देने के लिए इतने पैसे नहीं हैं और अब मेरा दिमाग मत खाओ।" कामवाली रचना अपना मुँह लटकाकर चली गयी। एक दिन बाद जब वह आई तो लतिका ने उससे खुद ही पूछा- "कैसी है तुम्हारी बेटी?" "ठीक है मैडम इंजेक्शन लग गया कुछ और दवा भी दी काफी ठीक हो गयी।" "इंजेक्शन कहाँ से आया? तुम्हारे पास इतने पैसे कहाँ से आये?" "मैडम कुछ बड़े लोगों ने मेरी मदद कर दी।" "अच्छा! कौन बड़े लोग?...

आस्था

  ​आस्था का नाम तो आस्था था पर उसमें ईश्वर में कोई आस्था नहीं थी। ऐसा नहीं कि वह नास्तिक थी पर व्रत त्योहार, पूजा पाठ मंदिर में उसकी कोई रुचि नहीं थी। रुचि थी तो बस कर्म में वह काम को ही पूजा मानती थी। ​माँ हमेशा कहती थी बेटा कर्म में आस्था अच्छी बात है पर थोड़ी आस्था ईश्वर में भी होनी चाहिए। कोई एक ऐसी शक्ति है जो हमें बुराई से बचाती है हमारी मदद करती है पर  आस्था सब  सुनकर अनसुनी कर देती। माँ ने अब कहना ही छोड़ दिया। ​एक दिन ऑफिस में उसकी नाईट शिफ्ट थी। रात में सिर्फ दो लोग ही बचे थे। ड्राइवर बीमार था इसलिए कैब की सुविधा भी नहीं थी। पहले तो आस्था ऑफिस जाने से हिचकिचाई लेकिन फिर उसने सोचा कि ऑटो तो मिल ही जायेगा। ऑफिस काफी दूरी पर था इसलिए वह  खुद की गाड़ी से भी नहीं जा सकती थी। ऑफिस की  शिफ्ट की रात के दो बजे  वह घर के लिए ऑफिस से निकली। हालांकि रास्ता सुनसान था पर आस्था को लगा ऑटो  तो मिल ही जायेगा न उसने किसी को फोन किया न घर वालों को। वह पैदल ही आगे बढ़ने लगी कि  हो सकता है थोड़ी दूर पर सवारी मिल जाय। ​यह उसका पहला अनुभव था जब वह रात में अकेले...