देवी

 

चौदह वर्षीय रहीम दौड़ता हुआ सलमा के कमरे में आया। "अम्मा - अम्मा! बाहर पुलिसवाले आये हैं और बड़े साहब है तुम्हारा नाम सबसे पूछ रहे हैं।"

सलमा सोचने लगी, वह रंगीन दुनिया तो कब की  छोड़ आयी है। अब तो जवानी भी नहीं बची। मुझे अब यहाँ कौन पूछ रहा है! बीस साल से ज्यादा हो गए....  आखिरी बार रेशमा ही आई थी रहीम को उसे देने के लिए जिससे उसे कोठे की बुरी हवा न लगे।  बच्चे का हाथ पकड़ाकर वह हमेशा के लिए दुनिया से रुखसत  हो गई। तब से लेकर आज तक न सलमा ने कभी उन  गलियों का रुख किया  था न कोई उसके पास आया। अब अचानक से कौन आ गया? इन्ही ख्यालो के उधेड़ बुन में सलमा  को एक आवाज़ ने जैसे नींद से जगा दिया।  

"सलमा जी आप ही का नाम है ?" एक तीस वर्षीय युवक पुलिस की वर्दी में पूछ रहा था। सलमा ने घबराते हुए स्वर में कहा.. जी, मै ही सलमा हूँ पर मैंने कुछ नहीं किया।  

युवक ने एकदम से उसके पैर छु लिए। सलमा हड़बड़ा गयी कि ये क्या हो रहा है! युवक ने उसे सँभालते हुए कहा, आप उम्र में मेरी माँ जैसी हैं। सुना था, कोठेवाली घर तबाह करती हैं पर अगर आप न होतीं तो आज मेरी माँ जिन्दा न होती.....मैं यहाँ न होता। 

सलमा को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या बोल रहा है ? युवक ने उसे याद दिलाने के लिए बताया कि मेरे पिताजी का नाम दिनेश शर्मा था और वह आप के कोठे पर जाया करते थे। घर में बहुत झगड़े भी होते थे इसको लेकर लेकिन जब मेरी माँ की हालत गंभीर थी तो आपने ही हॉस्पिटल आकर उनके इलाज के पैसे दिए थे जिससे वो ठीक हो गई।  पिताजी तो नहीं रहे पर मेरी माँ ने मुझे इस काबिल बनाया।  मेरी माँ की जान बचने वाली मेरे लिए किसी देवी से कम नहीं। इसीलिए आप को ढूढ़ते हुए यहाँ आया। आप मेरे साथ चलिए। 

"नहीं बेटा , तूने मुझ कोठे वाली को देवी कहा, यही मेरे लिए दुनिया में सबसे बड़ी इज्जत है। तू हमेशा खुश रहे , कभी कभी आ जाया करना।  मेरे लिए इतना ही बहुत है।" इतना कह कर सलमा ने उसे सीने से लगा लिया

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