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Showing posts from May, 2026

निवेश

  ​आशुतोष और अभय अच्छे मित्र थे। स्कूल से कॉलेज तक का सफर एक साथ तय किया। आशुतोष के पिता एक समृद्ध व्यापारी थे इसलिए उसके स्नातक होते ही उन्होंने व्यापार की जिम्मेदारी उसे देते हुए कहा, "आज तक मैंने बहुत मेहनत की, एक छोटे से निवेश से इसे यहाँ तक लेकर आया। अब तुम इसे नई ऊँचाई दो।" आशुतोष के पिता की बात मानते हुए कारोबार की सभी जिम्मेदारियाँ अच्छे से उठा लीं और शीघ्र ही एक सफल कारोबारी भी बन गया। बेटे की इस उपलब्धि से पिता का मन बहुत ही हर्षित हो गया। उन्होंने शीघ्र ही एक अच्छी लड़की देखकर अपनी अंतिम जिम्मेदारी से मुक्ति पाते हुए आशुतोष की शादी कर दी। आशुतोष की पत्नी एक बड़े घराने की सुंदर और पढ़ी-लिखी लड़की थी पर अपने रूप और धन का अभिमान था उसमें। आशुतोष सब कुछ होने के बाद भी हंसमुख और सौम्य था। ​अभय अब भी संघर्षशील था क्योंकि कोई सहारा नहीं था कि सभी जिम्मेदारियाँ उसके कंधे पर आ गई थीं  माँ ने बहुत मेहनत से इसे पाला-पोसा था। पिता का साया सिर से बचपन में ही छिन गया था, अब बूढ़ी माँ की एकमात्र उम्मीद अभय ही था। अभय ने मेहनत करते हुए पार्ट-टाइम जॉब और ट्यूशन करते हुए अपनी पढ़ा...

खोटा सिक्का

  ​हरिपुर गाँव के प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक श्री दीनानाथ जी बहुत ही सरल और अपने सच्चे मायनों में शिक्षक थे। हर छात्र उनका अपना ही बेटा या बेटी था। उनकी कोशिश यही रहती थी कि उनका पढ़ाया हर बच्चा भविष्य में कुछ अच्छा करे। स्कूल के अलावा वह घर पर भी बच्चों को मुफ्त में पढ़ाते थे। उनका सबसे प्रिय विद्यार्थी राजीव पढ़ने में बहुत ही होशियार था। ​इस कारण वह मास्टर साहब और उनकी पत्नी दोनों का प्रिय था। चूँकि मास्टर साहब की कोई संतान न थी, तो वह हमेशा राजीव जैसे होनहार बच्चे को अपने बेटे की तरह लाड करते थे। उनकी पत्नी तरह-तरह के व्यंजन उनके लिए बनाती थीं और अपने हाथों से ही उसे खिलाती थीं। ​मास्टर जी की कक्षा में रमेश भी था जो पढ़ने में औसत से भी कम था। समझाने के बावजूद भी वह कम समझता था। मास्टर जी को लगता था कि शायद यह मेहनत नहीं करता, वह उसे हमेशा डाँटते रहते और कहते— "तू मेरी कक्षा का सबसे खोटा सिक्का है, जो नहीं चलेगा। मेहनत कर, नहीं तो सच में खोटा सिक्का बन जाएगा।" ​रमेश चुपचाप मास्टर जी की डाँट सुन लेता और कोशिश करता कि मास्टर जी उससे खुश रहें, पर ऐसा कभी न हुआ। समय धीरे-ध...