पहचान
पार्टी में बहुत चहल पहल थी, जो होना लाजिमी भी है क्योंकि शहर के सबसे अमीर किशनदास के बेटे की शादी जो थी। पार्टी में एक से एक बड़े नामचीन लोग जो या तो खुद बड़े धनाढ्य थे या अपने विधा में महारत हासिल लोग। और इस पार्टी में उन बड़े लोगो की पत्नियां भी थी जो जगह जगह एक ग्रुप में बातचीत कर रही थी। मुद्दा किसी का मेकअप ,किसी का हेयर स्टाइल , किसी का चरित्र चित्रण ; या किसी की व्यक्तिगत जिंदगी के बारे में टीका टिप्पणी।
तभी उन महिलाओं
की नज़र पार्टी में अभी-अभी आये एक मेहमान पर पड़ जाती है। उनमे से शायद एक ने उसे पहचाना
," अरे यह तो शिवानी है जो हमारे साथ कॉलेज में थी पर यह यहाँ कैसे? "
उसका कौतुहल
बढ़ गया और वह खुद मेहमान के पास पहुंची और उसे याद दिलाया कि वह उनकी कॉलेज में थी। . उस महिला ने मुस्कराते हुए कहा
"हाँ मुझे याद है और ख़ुशी भी कि इतने सालों बाद भी तुम लोगों ने मुझे पहचान लिया। बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ा “तुम्हारे पति
नहीं आये ", बच्चे कितने हैं ? महिला ने मुस्कराते हुए जवाब दिया "बस तलाश
जारी है " उन महिलओं के चेहरे पर आश्चर्य की एक रेखा सी आ गई।
आगुन्तक ने उन महिलाओं के आश्चर्य को कम करने का
प्रयास करते हुए पूछा कि "तुम सब बताओ , जिंदगी
कैसी चल रही है " फिर क्या था , उनमे से हर महिला ने जिंदगी नहीं , दौलत और शोहरत का परिचय कराया और अपनी पहचान
किसी लेखक , नेता ,व्यापारी या किसी अधिकारी की पत्नी के रूप में कराया। साथ ही उस
आगंतुक महिला के जीवन पर अफ़सोस भी किया कि वह अभी तक अकेली है वरना उसकी भी एक पहचान
होती। पर उन्हें एक बात परेशान कर रही कि कोई पहचान न होते हुए भी वह इस पार्टी में कैसे ?उनमे से एक
से न रहा गया।
आखिर उसने पूछ ही लिया
"अरे ये बताओ , तुम यहाँ कैसे ?" मेरा मतलब कि तुम्हारी तो शादी भी नहीं
हुई फिर क्या करती हो ? "कुछ नहीं , बस नौकरी " महिला ने मुस्कुराते हुए
जवाब दिया "पर .. "
अभी उनका प्रश्न
पूरा हो पाता तभी किशनदास जी आ गए और उन महिलाओं से आगुन्तक महिला का परिचय कराते हुए
बोले "इनसे मिलिए , ये है शिवानी जो हमारे अखबार की सम्पादिका है, यह बात
अलग है कि नाम शिवानी नहीं है अख़बार में और
ये एक महशूर लेखिका भी है कई किताबे छप चुकी हैं।
कई सारे सम्मान प्राप्त हो चुके है, इनकी कलम में जैसे जादू है ।
महिलाओ का मुँह
आश्चर्य से खुला रह गया कि अभी तक वह जिस पर अफ़सोस कर रही थी , पहचान पूँछ रही
थी उसकी पहचान तो खुद की है , उसके काम
की , उनके पहचान से कहीं बड़ी पहचान।
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