रिश्ते का बोझ
एक लड़की जब १५-१६ वर्ष के बीच होती है , तभी से घरवालों , पास पड़ोस की नजरो में सयानी हो जाती है। जमाना कितना भी आधुनिक क्यों न हो लड़कियों के लिया कुछ मानक आज भी लगभग वैसे ही है। और अगर २५ के अंदर तक शादी न हुई तो उम्र ही ख़त्म मान ली जाती है। इस चक्कर में जो भी, जैसा भी,चलता है, और लड़की को अनचाहे रिश्ते का बोझ ढोने के लिए विवश किया जाता है।
ऐसा ही कुछ शुचि
के साथ भी हुआ था.लेकिन उसके आत्मबल ने उसे बचा लिया। उम्र ३० पार हो गयी थी। पारिवारिक जिम्मेदारियाँ और अच्छे लड़के की चाहत
में पता ही नहीं चला. अचानक से किसी ने एक दिन एक लड़के के बारे में बताया। इंजीनियर
था, यह सुनकर घर में ख़ुशी की लहर दौड़ गयी। शुचि ने स्वयं से यह स्पष्ट किया कि दहेज
में एक रुपये की भी उम्मीद न करें।
जैसे तैसे खींचतान
के बात आगे बढ़ी और सगाई तक बात आयी तो शुचि ने लड़के को देखा भी नहीं था। शुचि सामने
से एक बार मिलना चाहती थी पर मौसा जी फोटो
दिखा कर बोले "लड़का इंजीनियर है , अब क्या देखना? बस आते ही सगाई कर दो ".
आनन फानन में सगाई की तैयारियां हुई और नियत समय पर
सगाई की रस्मे भी पर लड़के को देखकर शुचि सन्न रह गई। कोई मैच नहीं था उसका मेल बिलकुल
ब्लैक एंड वाइट । शुचि तो जैसे मन ही मन तय कर चुकी थी कि उसे ये सगाई नहीं करनी ,पर
मामाजी के समझाने पर वह मन मारकर तैयार हो गई। सगाई हो गई , साथ ही साथ लड़के के घरवालों
के ताने शुरू "इतने रिश्ते आये थे पर नवीन को क्या हो गया
जो यही अटक गया "साथ ही सगाई की अंगूठी की कीमत , साड़ी की कीमत सब
बतायी जाने लगी।
शादी कुछ महीनो
बाद रखी गई। नवीन रोज शुचि से बात करता और उसे
बिना मन के उसकी बातों में हाँ में
हाँ मिलानी पड़ती।
एक दिन अचानक
से फरमान आया , शादी में इतने लाख रुपये कैश चाहिये या सारे पैसे
लड़के वालो को दे दिए जाए और उनके घर जाकर शादी होगी। इस बात पर खींच तान शुरू हुई पर
जब शुचि ने नवीन से बात करनी चाही इस बारे
में तो उसने भी अपने घर वालो का ही समर्थन किया। शुचि ने सोचा था रूप न सही पर मुझे
प्यार तो करेगा ,मेरे साथ तो रहेगा पर यहाँ तो पहले कदम पर ही उसने साथ छोड़ दिया।
कभी सास ,कभी
देवर ,सब एक एक करके फ़ोन करते और सुनाकर नसीहते देने लगते। यह सिलसिला ३ महीने तक लगातार
चला। एक दिन शुचि ने वो निर्यण लिया , जो उसके
खानदान में कभी नहीं हुआ था। उसने मन ही मन यह निश्च्य किया कि उसे यह शादी नहीं
करनी। उसने अपनी माँ को यह बात बताई। माँ पहले तो ऊंच-नीच की बात करने लगी पर पैसे
की बात पर चुप भी हो गई।
छोटी बहन भी
तो थी ,उसका क्या होता अगर सब शुचि की शादी में ही खर्च हो जाता। माँ ने अधूरे मन से
स्वीकृति दे दी।
इस पूरे प्रकरण
में सबसे अधिक बुरी बात शुचि को यह लगी की नवीन ने उसका फ़ोन उठाना भी बंद कर दिया।
शुचि के अंतर्मन में हलचल सी मच गई ,आख़िर कहा
जा रही है वह ? फिर उसने वही किया जो उसके मन ने किया। हालांकि रिश्तेदारों ने विरोध भी किया। पर वह केवल दिखावा क्योंकि उन्हें
तो सिर्फ सलाह देनी थी,और तो कुछ करना नहीं था.
इसलिए शुचि
ने साफ़ साफ़ कह दिया कि वह यह शादी नही करेगी । उसी
दिन नवीन ने उसे एक हृदयस्पर्शी संदेश भी भेजा। लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। नवीन का
भाई अंगूठी वापस करने आया। शुचि ने स्वयं अंगूठी दी और कहा "मैं तुम्हारे घर जाती
तो मुझे कुछ खास नहीं मिलता ,पर तुम्हारे घर की नस्ले सुधर जाती "
उसका भाई गुस्से
से तिलमिला उठा पर अब शुचि को कोई डर नहीं था। उसने आगे भी भड़ास निकाली और कहा
"जितने पैसे तुम लोगों ने माँगे थे उससे दूने पैसे में भी तुम्हारा भाई कभी मेरे
जैसा नहीं हो सकता " उसके भाई ने कहा "आप ज्यादा बोल रही हैं " तो शुचि
ने कहा "इज्जत सबकी होती है। आज खुद पर आयी तो तिलमिला गए। मै ३ महीने से झेल
रही हूँ। आज तुम्हारे भाई ने भी मैसेज किया
था पर अब बस । मै रिश्ते निभाना चाहती हूँ, सम्मान करना चाहती हूँ ,न कि रिश्तों का बोझ ढोना
चाहती हूँ । यह कहते हुए शुचि ने अंगूठी वापस कर दी और लड़के वालो की बात करने की कोशिश
पर विराम लगा दिया।
और इस रिश्ते
का बोझ उतारकर एक नए रास्ते पर चल पड़ी। यह
रास्ता उसकी उन्नति और प्रगति की ओर जाता था।
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