निवेश

 


​आशुतोष और अभय अच्छे मित्र थे। स्कूल से कॉलेज तक का सफर एक साथ तय किया। आशुतोष के पिता एक समृद्ध व्यापारी थे इसलिए उसके स्नातक होते ही उन्होंने व्यापार की जिम्मेदारी उसे देते हुए कहा, "आज तक मैंने बहुत मेहनत की, एक छोटे से निवेश से इसे यहाँ तक लेकर आया। अब तुम इसे नई ऊँचाई दो।" आशुतोष के पिता की बात मानते हुए कारोबार की सभी जिम्मेदारियाँ अच्छे से उठा लीं और शीघ्र ही एक सफल कारोबारी भी बन गया। बेटे की इस उपलब्धि से पिता का मन बहुत ही हर्षित हो गया। उन्होंने शीघ्र ही एक अच्छी लड़की देखकर अपनी अंतिम जिम्मेदारी से मुक्ति पाते हुए आशुतोष की शादी कर दी। आशुतोष की पत्नी एक बड़े घराने की सुंदर और पढ़ी-लिखी लड़की थी पर अपने रूप और धन का अभिमान था उसमें। आशुतोष सब कुछ होने के बाद भी हंसमुख और सौम्य था।

​अभय अब भी संघर्षशील था क्योंकि कोई सहारा नहीं था कि सभी जिम्मेदारियाँ उसके कंधे पर आ गई थीं  माँ ने बहुत मेहनत से इसे पाला-पोसा था। पिता का साया सिर से बचपन में ही छिन गया था, अब बूढ़ी माँ की एकमात्र उम्मीद अभय ही था। अभय ने मेहनत करते हुए पार्ट-टाइम जॉब और ट्यूशन करते हुए अपनी पढ़ाई आगे भी जारी रखी थी और अब वह प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने लगा। इन सब जिम्मेदारियों में अभय और आशुतोष एक ही शहर में रहकर भी मिल न सके।

​एक दिन बाज़ार में आशुतोष ने अभय को कड़ी धूप में पैदल जाते देखा। उसने अपने ड्राइवर को कहा कि वह उसे उसके पास ले चले। पास जाते ही आशुतोष ने कार का दरवाजा खोलकर अभय के कंधे पर हाथ रख दिया। अभय ने जैसे ही पलट कर देखा तो—आशुतोष! दोनों की खुशी का ठिकाना न रहा। आशुतोष ने अभय से कहा,  हम इसी शहर में रहते हैं और इतने व्यस्त कि आज इतने दिनों बाद मिलना हो पा रहा है।" वह भी अचानक,  मैने तो शादी भी कर ली।" क्या कर रहे हो? शादी की या नहीं?" एक सांस में न जाने कितने सवाल पूछ लिए, फिर खुद ही बोला, "मैं भी कितना पागल सब इस धूप में खड़े-खड़े पूछ रहा हूँ। चलो, मेरे साथ कहा जा  रहे हो?"

​अभय ने कहा, "थोड़ी दूर पर साइकिल की दुकान है, वही मरम्मत करने को दी है, वही लेने जा रहा हूँ।"

​आशुतोष ने कहा, "मैं भी उसी रास्ते जा रहा हूँ। पहले घर चलो, तुम्हें अपनी बीवी से मिलाऊँ, वापसी में दुकान पर छोड़ दूँगा।"

​अभय ने जवाब दिया, "नहीं, घर पर माँ अकेली हैं, मुझे पहुँचने की चिंता है, और तुमने शादी का भी पहली बार बताया, जाऊँगा तो क्या खाली हाथ जाऊँगा? फिर कभी आऊँगा।"

​"मैं यह सब कुछ नहीं जानता, तुम्हें घर चलना ही पड़ेगा नहीं तो मैं नाराज़ हो जाऊँगा।" आशुतोष की जिद के आगे अभय की एक न चली। रास्ते में उसने सारा हाल-चाल बताया, साथ ही उसकी सफलता एवं विवाह के लिए बधाई भी दी। घर आने पर आशुतोष ने अपने पिता से अभय का परिचय करवाया, फिर अपनी पत्नी से परिचय करवाया। पत्नी ने उसे देखते ही बड़े बेरुखी अंदाज़ में नमस्ते का जवाब दिया और चली गई।

​वापसी में आशुतोष ने अभय को कहा, "मित्र, यह घर भी तुम्हारा है। पढ़ाई में तुमने मेरी जितनी मदद की थी और  माँ के हाथ के पकवानों का स्वाद आज भी मेरी ज़ुबान पर है, यह सब मुझ पर कर्ज़ है जो मैं उतार नहीं सकता। अब वह समय वापस नहीं आयेगा मगर तुम कभी कभी आ जाना मै भी आऊंगा  और  कोई मदद की ज़रूरत हो तो बताना, हम फिर साथ रहेंगे ताकि कुछ पुराने दिन फिर से वापस आ जाएँगे।"

​अभय ने  कहा कि वह फिर आयेगा, "हम फोन पर बात करेंगे, तुम भी घर आना, माँ को तुम्हें देखकर बहुत खुशी होगी।"

​आशुतोष की पत्नी ने अभय के जाते ही मुँह सिकोड़कर कहा, "ऐसे लल्लू के लोगों से तुम्हारी दोस्ती है? न कोई क्लास, न कोई स्टैंडर्ड।"

​आशुतोष ने उसे डाँटते हुए कहा, "कुछ भी बोल देती हो, धन का इतना घमंड ठीक नहीं।"

​फिर से आशुतोष और अभय अक्सर बातें करते, फोन पर मिलते जैसे पुराने दिन वापस आ गए हों। कभी-कभी आशुतोष अभय की कुछ मदद भी कर देता, जो उसकी पत्नी को बिल्कुल पसंद नहीं था। वह कहती, "ऐसे लुटाते रहोगे तो एक दिन हम ही कंगाल हो जाएँगे।" आशुतोष उसे समझाते हुए कहता कि वह कुछ भी बुरा नहीं कर रहा, बल्कि अपनी दोस्ती में 'निवेश' कर रहा है। पत्नी नाक चढ़ाते हुए कहती, "क्या निवेश? ये कंगाल लोग तुम्हें दे ही क्या सकते हैं?" आशुतोष अपने तर्कों से उसे हर बार चुप कर देता।

​एक दिन अभय को सूचना मिली कि मामा का देहांत हो गया है। आनन-फानन में माँ के साथ मामा के घर को  चल देता है घर  रास्ते में अभय का मोबाइल भी चोरी हो जाता है, पर पहुँचने की जल्दी में वह पहले मामा के घर पहुँचता है। मामी और दो छोटे बच्चे, विरासत सिर्फ एक वह छोटा सा व्यवसाय था। अभय का संघर्ष अब और भी कठिन हो गया   घर  भी किराये का था  इसलिए वह अब वहीं शिफ्ट हो गया। मामी और बच्चों की भी अपने भाई-बहनों की तरह देखभाल करने लगा, साथ ही पढ़ाई और तैयारी भी। इन सब के बीच दो दोस्तों का साथ एक बार फिर से छूट गया। आशुतोष ने उसे खोजने की कोशिश की पर क्योंकि उसका अपना घर   था नहीं, इसलिए कुछ ख़ास पता नहीं चल पाया कि वह कहाँ है।

​समय बीतता गया, एक दिन व्यापार में आशुतोष को बड़ा नुकसान हो गया था। दुकान, मकान गिरवी हो गए।  समय का किसी को नहीं छोड़ता, राजा से रंक और रंक से राजा बनते देर नहीं लगती। आशुतोष अब शहर के एक कोने में दो कमरे के मकान में किराये पर रहकर एक साहूकार के यहाँ हिसाब-किताब का काम देखने लगा। एक दिन हिसाब में थोड़ी सी चूक के कारण साहूकार ने उसे नौकरी से निकाल दिया। अब जिंदगी भी मुश्किल लगने लगी, उसके साहूकार ने उसकी मदद करनी चाही पर उसके स्वाभिमान ने ऐसा न होने दिया। पत्नी मायके चली गई और आशुतोष बिल्कुल अकेला हो गया।

​एक दिन निराशा में वह अपने स्कूल की ओर चला गया जहाँ उसका गुजरा समय जैसे ठहर सा गया हो। उसे पुरानी यादें, अभय की याद आने लगी। स्कूल में बिताया हर दिन उसकी आँखों के सामने से गुज़र गया। आँखों में आँसू लिए वह सोच रहा था कि अब न तो पिता जी रहे न ही किराये का घर था  दो  महीने का किराया अभी बाकी था। दो दिन बाद उसे मकान खाली करना था। उधेड़बुन में वह बेहोश सा चलता जा रहा था। घर के  पास आकर वह बेहोश हो गया।

​आँख खुलने पर उसने खुद को एक बड़े आलीशान और शानदार AC वाले कमरे वाले हॉस्पिटल में पाया। उसने नर्स से पूछा, "मैं यहाँ कैसे?" नर्स ने बताया, "एक साहब जो कोई बड़े अफसर लगते हैं, वही लेकर आये हैं आपको। उन्होंने अधिकारियों से कहा कि 'कोई कमी नहीं हो।' उन्होंने नर्स से पूछा 'कहाँ है वह?' नर्स ने कहा, 'आप आराम करिए, मैं उनको बता देती हूँ, कमजोरी और चिंता के कारण आप बेहोश हो गए थे, अब ठीक हैं।'"

​नर्स ने बाहर खड़े व्यक्ति को अंदर बुलाया। उस व्यक्ति को देखते ही आशुतोष के मुँह से निकला, "अभय... तुम!"

​अभय ने कहा, "हाँ दोस्त, किस्मत से हम दो बार बिछड़े, एक बार तुमने मुझे ढूँढा और इस बार मैंने तुम्हें।"

​"पर तुम कहाँ चले गए थे? न कोई पता, न फोन?"

​अभय ने सारी बीती बातें उसे एक-एक करके बतायीं, फिर उसने आशुतोष से पूछा, "भाभी कहाँ हैं और यह सब कैसे?" आशुतोष ने व्यापार के घाटे और अपनी पत्नी के बारे में सारी बातें बतायीं, जो दो बच्चों के साथ मायके चली गई थी। फिर अभय बोला, "ज़िंदगी ने हम दोनों के साथ बहुत गलत किया पर अब जो भी हो, हम एक दूसरे का साथ नहीं छोड़ेंगे।"

​आशुतोष ने कहा, "नर्स कह रही थी कि कोई बड़े अधिकारी आपको यहाँ लेकर आये हैं?"

​"हाँ, उसने सही कहा दोस्त, तुम्हारे प्यार और के आशीर्वाद से अब मैं I.P.S. officer हूँ।" आशुतोष की खुशी का ठिकाना न रहा। उसने उसे बधाई देते हुए कहा, "बधाई हो दोस्त! पहले जैसे हालात होते तो मैं तुम्हारी इस सफलता पर एक शानदार पार्टी देता, पर अब तो..."

​"अब तो, अब तो क्या?  मैं सब जानता हूँ। इस शहर में आते ही सबसे पहले तुमको ढूँढा गया, जहाँ मुझे सारी बातें पता चलीं। पर भाभी के बारे में नहीं जानता था कि वह मायके में हैं।"

​"दोस्त, तुम तो जानते ही हो, बड़े बाप की बेटी थी, मेरे साथ क्यों रहेगी अब?"

​"ऐसी बात नहीं है दोस्त, भरोसा रखो, जल्दी ही सब ठीक होगा।  घर चलो " कौन सा घर, कैसा घर? ।" अभय उसे उसके पुराने  घर ले गया जहां आशुतोष के आश्चर्य की सीमा न रही जब सब कुछ पहले जैसा था। उसकी पत्नी भी वहाँ थी, उसने उसे देखते ही माफ़ी माँगी, "मुझे माफ़ कर दो, जब तुम्हें मेरे साथ की सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी, तब मैंने आपका साथ छोड़ दिया।"

​आशुतोष ने अभय के कहने से उसे माफ़ कर दिया और फिर अभय से प्रश्न किया, "दोस्त, यह सब क्या है? "तुम दोस्ती भी करते हो और दोस्त पर भरोसा भी नहीं? बड़ी मुश्किल से तुम्हारा पता मिला। वहाँ पहुँचते ही तुम बेहोश मिले, पहले तुम्हें हॉस्पिटल पहुँचाया, बाद में सब ठीक किया। जो तुम्हारा था, वह सब तुम्हारा ही है, बस पिताजी को वापस नहीं ला सकता।"

​आशुतोष ने आँसू पोंछते हुए अपनी पत्नी से कहा, "देखा! जब मैं कभी इसकी मदद करता था तो तुम चिढ़ जाती थीं, और मैं कहता था कि यह मेरा दोस्ती में 'निवेश' है। तुम कहती थीं कि ऐसे लोग क्या दे पाएँगे? देखा आज, मेरे 'निवेश' ने मुझे वापस जीने की वजह दे दी, मेरा आत्मसम्मान वापस कर दिया।"

​आशुतोष की पत्नी ने अभय से माफ़ी माँगते हुए कहा, "भैया, मुझे माफ़ कर दीजिए, अमीरी के घमंड में मैं इंसानों को पहचान नहीं पाती थी। रिश्ते-नाते सब मेरे लिए पैसा ही था, पर आपने मुझे एक नई दिशा दी है। मैंने आपका अपमान किया, आपको छोटा समझा, मुझे माफ़ कर दीजिए। सच तो  यह है कि इंसान कर्मों से महान होता है, और आप तो मन, वचन, कर्म सबसे अच्छे हैं। आज से मैं आपको अपना बड़ा भाई मानती हूँ।"

​आशुतोष ने कहा, "और अभय, अब पिताजी रहे नहीं, अब जब मेरी  बीबी के भाई भी बन गए हो, तो मुझे वादा करो कि अब तुम जब भी यहाँ आओगे, हमारे साथ रहोगे। मुझे माँ और भाई दोनों का प्यार एक साथ मिल जाएगा और मेरी बीवी को भी सासू माँ की सेवा का पुण्य मिल जाएगा।"

​अभय ने हँसते हुए कहा, "बात तो ठीक कह रहे हो, पर भाभी से पूछ लो कि खाना तुमसे ही न बनवाएँ।" उसकी  बात सुनकर तीनों एक साथ हँस पड़े और अभय ने आने का वादा कर उनसे विदा ली।

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