सेवानिवृति

 

आज ऑफिस में बहुत चहल पहल थी। कोना कोना शीशे की तरह चमक रहा था और चमकना भी चाहिए था क्योंकि आज ऑफिस के सबसे वरिष्ठ सफाई करनी रमेश जी का रिटायरमेंट था उनके सम्मान में आज ऑफिस में पार्टी रखी गई थी छोटे कर्मचारी से लेकर बड़े साहब तक रमेश जी के मुरीद थे 35 साल की नौकरी में उन्होंने कभी किसी को शिकायत का मौका नहीं दिया ।किसी की छुट्टी हो किसी को जल्दी जाना हो या किसी के हिस्से का काम रमेश जी हर किसी काम कर देते थे। सफाई कर्मी होने के साथ-साथ वह स्नातक भी थे उनके ऑफिस के साहब लोग भी अपना छोटा मोटा काम दे देते थे। कभी न थकने वाले सदैव मुस्कुराने वाले सब के प्रिय रमेश जी का आज अंतिम कार्य दिवस था सभी बड़ी बेसब्री से उनका इंतजार कर रहे थे पर आज तक कभी ऑफिस देर से ना आने वाले रमेश जी आज समय के बाद भी नहीं आए। सभी फोन पर फोन कर रहे थे पर फोन उठ नहीं रहा था । सभी परेशान थे कि आखिर रमेश जी को क्या हुआ? रमेश जी बेमन से तैयार हो रहे थे पर जैसे खुशी छीन सी गई हो 35 साल की नौकरी अब आदत सी बन गए थी और आज वह आदत छूटती सी लग रही थी सब जिस सेवानिवृत्ति का इंतजार करते हैं वह रमेश जी के लिए बोझ सी हो गई हो। देखते देखते दिन जैसे आंखों के सामने से गुजर रहा था। थी तो सफाई कर्मी की नौकरी रमेश जी ने उसे कभी छोटा नहीं माना नौकरी ही उनके वृद्ध माता पिता और भाई बहनों का सहारा बनी भाई बहन की पढ़ाई शादी खुद की शादी बच्चे बच्चों कि पढ़ाई शादी सब कुछ इस नौकरी के कारण हुआ था। रमेश जी अपने काम से प्यार करते थे आज तक ऑफिस में कितने लोग आए गए किसी ने कभी शिकायत नहीं थी उल्टा उनकी तारीफ के बिना नहीं रह पाते सब कुछ छुटता सा नजर आ रहा था उन्हें ऐसा लग रहा था जैसे नौकरी नहीं कोई उनकी सांसे छीन रहा हो जैसे तैसे वह ऑफिस पहुंचे वह सब लोगो ने उनका स्वागत किया। सब ने उनके सम्मान में कुछ न कुछ जरुर कहा और अपने अपने सामर्थ्य के हिसाब से कुछ न कुछ उपहार भी दिया। ऑफिस के बड़े साहब ने कहा "रमेश सिर्फ सफाई कर्मी नहीं बल्कि हमारे ऑफिस के लिए प्राण वायु जैसे थे हम सबको इनकी आदत सी हो गई है नहीं नहीं थी शायद ऑफिस पहले जैसा चमकदार न रहे हम सब इनके आगे के स्वस्थ जीवन की कामना करते हैं और इनकी सेवा में लिए इनका शुक्रिया भी " तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा हाल गूंज उठा अब बारी रमेश जी की थी कि वह कुछ कहे पर रमेश जी जैसे रो हो पड़े हो जैसे तैसे खुद को संभालते हुए बोले "आप सबने 30 साल में इतना प्यार दिया कि मुझे ऑफिस भी परिवार सा लगने लगा नौकरी में परिवार को समय नहीं दे पाया लेकिन यहां आकर कभी परिवार की कमी नहीं खली किसी का भाई किसी का बेटा और किसी का अंकल ऐसा लगा जैसे या ऑफिस ना हो दूसरा परिवार हो आज जब अपने पहले परिवार के साथ वक्त बिताने का समय मिला है तो मुझे खुशी कम दुख ज्यादा है मुझे भी आप सबकी इस ऑफिस की आदत सी हो गई है मेरा काम मेरे जीने की वजह था आज ऐसा लग रहा है कि सेवानिवृत्ति मेरे लिए किसी सजा सी हो गई है पर नियम तो नियम है आप सबकी याद दिल में रखकर आगे जिन्दगी का मकसद ढूढ़ने का प्रयास करूंगा” रमेश की बात सुनकर सब के चेहरे पर दुख साफ़ झलक रहा था पर सबने हँसते हँसते रमेश जी को विदा दी। आज घर पर रमेश जी का पहला दिन था समय से चाय नाश्ता सब मिल गया पर नहीं मिला तो अपनों का साथ क्योंकि सभी अपने-अपने कामों में व्यस्त थे। रमेश जी के लिए दिन बिताना मुश्किल था हो गया 1-2 दिन कुछ लोग मिलने आए फोन पर बातें की लेकिन फिर वही खालीपन पत्नी का साथ वर्षों पहले ही भगवान ने छुड़ा दिया तब से नौकरी ही ख़ुशी का कारण थे पर अब सब खाली- खाली सा लग रहा था एक दिन रमेश जी सब्जी लेने जा रहे थे तो उन्होंने गली में कुछ लड़कों को जो 15 से 16 साल की उम्र के थे शराब पीते पत्ते खेलते देखा थोड़ी दूर जाने पर जो बस्ती थी वहां से ऐसी गंध आ रही थी कि वहां से गुजरना मुश्किल हो गया था पहले सुबह-सुबह ऑफिस चले जाते थे तो ये सब नहीं देखा था पर आज यह सब देख कर उनसे मन में अजीब सी बेचैनी हो गई ।मानो उनके अंदर का सफाई कर्मी यह कह रहा था "यहां भी तो कितनी गंदगी है इसे साफ करना तेरी भी जिम्मेदारी है। एक दो दिन के बाद रमेश जी लड़कों से मिले जो गलत आदतों के शिकार थे। उनसे बात की पूछा पूछने पर पता चला कि सब उसी बस्ती के ही बच्चे हैं जहां बहुत जिंदगी है मां बाप सुबह काम पर निकल जाते हैं फिर कोई देखने वाला नहीं कुछ स्कूल गए हैं कुछ ने तो स्कूल का मुँह भी नहीं देखा सरकारी विद्यालय में मिलने वाला खाना खाकर भाग आते थे रमेश जी ने उनसे कहा कि अगर वो रोज उन्किहें दो तीन घंटे का समय दे तो वह उन्हें ५० रुपये देंगे । पैसे के लालच में सभी ने रमेश जी को समय दिया सफाई में सहयोग किया। रमेश जी ने उन्हें साथ खाना खिलाकर थोड़ा पढ़ाया बच्चों को भी आज कुछ अलग अनुभव हुआ दूसरे दिन सभी समय से आ गए । बच्चों ने रमेश जी से ने कहा “आप रहने दीजिए हम सफाई का काम खुद कर देंगे" उन बच्चों की देखा देखी बस्ती के दूसरे बच्चे भी उनका सहयोग करने लगे महीने के अंत में जब रमेश जी उन बच्चों को पैसा देने लगे तो उन बच्चों ने उनके पैर पकड़कर कहा "आप इतने अच्छे हैं जो हमारी तकलीफ समझते है हमें पैसे नहीं चाहिए हम पढ़ना चाहते हैं और आप जैसा अच्छा इंसान बनना चाहते हैं"। रमेश जी के चेहरे पर सफलता के भाव थे वह अपने उद्देश्य में सफल रहे यही तो चाहते थे कि अपने घर में ही उन्हें पढ़ाना शुरू किया। धीरे धीरे बस्ती के अन्य बच्चे भी आने लगे। स्कूल का आकार छोटा पर ख्याति बढ़ रही थी लोगो से मदद के प्रस्ताव आने लगे और रमेश जी का एक कमरे का स्कूल ११ कमरों के भवन में बदल गया। कुछ शिक्षित युवाओं ने अध्यापन कार्य में सहायता का प्रस्ताव दिया वो भी निःशुल्क । रमेश जी को उनके सेवा कार्य के लिए सम्मानित किया गया। रमेश जी ने मन ही मन मुस्कुराते हुए कहा ”आजीवन सेवा करूँगा मै कभी सेवामुक्त नही होना चाहता”। इस तरह रमेश जी ने अपने सेवानिवृत्ति को सेवा के दूसरे अवसर में बदलकर कभी सेवानिवृत्ति ना होने के संकल्प को पूरा किया।


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