पहचान
स्नेहा एक होनहार छात्रा होने के साथ-साथ एक कुशल नृत्यांगना भी थी और वह भी बिना किसी गुरु के मोबाइल में नृत्य प्रस्तुतियों को देखकर कभी-कभी टीवी के कार्यक्रमों को देखकर स्वयं की सृजनशीलता ने उसके नृत्य में चार चांद लगा दिया ।स्नेहा पढ़ने में तो होशियार तो थी लेकिन पिता का साया सर से जल्दी उठ जाने के कारण स्नातक स्तर से ही घर की जिम्मेदारियां उसके ऊपर आ गई सभी बहनों की शादी हो गई थी । भाई नहीं था लिया था सब कुछ संभालने की जिम्मेदारी स्नेह के कंधे पर आ गई । पर बिना किसी शिकायत के स्नेहा ने किस्मत के फैसले को मंजूर करते हुए घर और मां को भी संभाल लिया बस एक मन में हमेशा एक कसक रहती उसका नृत्य प्रेम अधूरा रह गया। पढ़ाई घर सब कुछ संभालने में उसके लिए समय ही नहीं मिलता और शौक से घर का खर्च तो चलता नहीं इसलिए उसने शौक और घर में से घर को चुना पर कहते हैं ना पहला प्यार कभी मरता नहीं ।जब कभी वह नृत्य की प्रस्तुति टीवी मोबाइल या किसी कार्यक्रम मैं देखती तो उसके मन में एक टीस जग जाती स्नेहा जिंदा तो थी पर उसकी सांसे नृत्य में ही बसती थी।
एक दिन ऑफिस में एक महिला स्नेहा के सहयोगात्मक रवैए से बहुत प्रभावित हुई इतनी कम उम्र और समझदारी ,काम की प्रति समर्पण देखकर उसके बारे में पूछा स्नेहा पहले तो संकोच में पड़ गई लेकिन सहयोगात्मक रवैए और अपनेपन से वह ज्यादा देर अपनी तकलीफ छुपा ना सकी उसने अपनी सारी तकलीफ उनको बता दी। अब उस महिला के मन में स्नेहा के लिए स्नेह के साथ-साथ आदर और भी बढ़ गया उन्होंने उससे वादा किया कि वह उसके नृत्य प्रेम को मरने नहीं देंगी। एक दिन उन्होंने स्नेहा को फोन कर एक नंबर दिया और बोला इस नंबर पर बात कर लो। नेहा ने उसे नंबर पर फोन किया तो पता चला कि वह संस्कृति विभाग के किसी अधिकारी का नंबर था उन्होंने स्नेहा से उसकी पढ़ाई और नृत्य कौशल के बारे में पूछा तो उसने बताया कि उसने कोई ट्रेनिंग नहीं ली खुद से सीखा है साथ ही एक वीडियो भी उनको भेज दिया ।अधिकारी ने बताया कि एक प्रशिक्षण शिविर का आयोजन संस्कृति मंत्रालय की ओर से किया जा रहा है जिससे उसको आधिकारिक रूप से भी मान्यता मिल जाए फिर वह उसको किसी कार्यक्रम में मौका अवश्य देंगे प्रशिक्षण नि:शुल्क है। स्नेहा ने एक हफ्ते ऑफिस से छुट्टी लेकर प्रशिक्षण प्राप्त किया स्नेहा की मां की बहुत खुश थी क्योंकि वह भी बेटी के नृत्य प्रेम को जानती थी इसलिए स्नेहा ने मौके की बात बताई तो उन्होंने तुरंत ऑफिस से छुट्टी लेने की बात कही और बोला "घर एक महीने थोड़े कम पैसे से भी चल जाएगा तुम अपने सपने को पूरा करो"।
मां का आशीर्वाद लेकर स्नेहा ने सफलतापूर्वक अपनी ट्रेनिंग को पूर्ण किया।
बस कुछ नृत्य की बारीकियां और आधिकारिक मान्यता की जरूरत थी जो उसे आज मिल गई। उसके नृत्य कौशल को सब सराहा उसकी तारीफ उन अधिकारी महोदय के पास भी पहुंची उन्होंने उसे एक बड़े सांस्कृतिक कार्यक्रम में नृत्य प्रस्तुति का अवसर दे दिया जो की एक महीने बाद होने वाला था। स्नेहा और उसकी मां बहुत खुश थी मानो बरसों बाद उनके मन की मुराद पूरी होने वाली थी लेकिन ईश्वर भी कभी-कभी खुशी और गम एक साथ दे देता है तीन-चार दिनों के बाद ही स्नेहा को चिकन पॉक्स हो गया। चेहरा शरीर कुछ भी अछूता न रहा चांद से चेहरे वाली स्नेहा को मानो ग्रहण लग गया । उसने कल्पना भी नहीं की थी वह खुशी उसे मिलते-मिलते इस तरह छीन जाएगी दुखी मन से उसने अधिकारी महोदय को सारी बात बताई और कहा कि वह यह प्रस्तुति नहीं दे पाएगी लेकिन अधिकारी महोदय ने जो उत्तर दिया उसने स्नेहा की उम्मीदों को फिर से जगा दिया उन्होंने कहा " अभी एक महीना है ठीक हो जाओगी परेशान ना हो"
स्नेहा 15 ,20 दिनों में ठीक तो हो गई पर उसने जब अपने चेहरे को आईने में देखा तो रो पड़ी साथ ही बीमारी की वजह से वह काफी कमजोर भी हो गई थी उसने फिर अधिकारी महोदय को फोन किया और कहा " सर मुझे माफ कर दीजिए यह मेरा दुर्भाग्य है कि इतने बड़े आयोजन का हिस्सा नहीं बन सकती ऐसे चेहरे के साथ" अधिकारी महोदय ने उसको ढांढस देते हुए कहा " मैने तुम्हारे अंदर जो लगन देखी है उसके कारण ही तुम्हें समझा रहा हूं की कार्यक्रम तो फिर से आएंगे लेकिन तुम्हें इस कार्यक्रम का हिस्सा न बनने से जो दुख होगा वह मैं समझता हूं मैं भी संघर्षों के बाद ही सफलता पाई है इसलिए तुम्हें समझा रहा हूं मन को शांत और एकाग्र करके बस अपने अभ्यास पर ध्यान दो चेहरे को ना देखो और मन से बड़ी कोई शक्ति नहीं होती तुम सब कर लोगी मुझे पूरा भरोसा है"।
अधिकारी महोदय की बात सुनकर स्नेहा अपनी सारी कमजोरी और चेहरे को भूल गई उसका मन उनके लिए आदर से भर गया।आज जहां सब चेहरे पर मरते हैं वहां उन्होंने उसकी कला को सराहा उसकी लगन की समझा वह उस पर इतना भरोसा दिखा रहे हैं तो अब उसे खुद से ज्यादा उनके भरोसे के लिए कार्यक्रम में भाग लेना है उसने जी जान लगाकर नृत्य का अभ्यास शुरू कर दिया और अंततः वह दिन भी आया जिसमें उसे अपनी मां के अपने और सबसे बड़े उन अधिकारी महोदय के विश्वास को भी बनाए रखने का दायित्व महसूस हो रहा था। एक बड़ा मंच एक राष्ट्रीय स्तर का आयोजन सामने बड़े-बड़े अधिकारी और जनता जैसे ही स्नेहा का नाम बुलाया गया नृत्य प्रस्तुति के लिए उसने मां का आशीर्वाद लिया और ईश्वर को याद कर सब कुछ भूल कर इस तरह प्रस्तुति दी कि प्रस्तुति के उपरांत भी तालियां बजती रही अन्य अधिकारियों ने भी स्नेहा की प्रशंसा की।उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि उसके रूप रंग से ज्यादा उसके काम की तारीफ हो रही थी । उसने सबसे पहले अधिकारी महोदय का आशीर्वाद लिया और कहा "सर अगर आपने हिम्मत ना दी होती तो यह नहीं हो पता"। अधिकारी महोदय ने कहा "यह सब तुम्हारी लगन और परिश्रम का फल है ईश्वर तुम्हें खूब उन्नति दे"। स्नेहा के लिए नए रास्ते खुल गए, नई-नई प्रस्तुतियों के अवसर मिलने लगे जिससे उसे आर्थिक सहायता भी मिली। उसने नौकरी छोड़ अपना पूरा ध्यान अपनी पढ़ाई पर और अपनी पहचान यानी की नृत्य को समर्पित कर दिया जिससे उसे एक नई पहचान दी।
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