खोटा सिक्का

 

​हरिपुर गाँव के प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक श्री दीनानाथ जी बहुत ही सरल और अपने सच्चे मायनों में शिक्षक थे। हर छात्र उनका अपना ही बेटा या बेटी था। उनकी कोशिश यही रहती थी कि उनका पढ़ाया हर बच्चा भविष्य में कुछ अच्छा करे। स्कूल के अलावा वह घर पर भी बच्चों को मुफ्त में पढ़ाते थे। उनका सबसे प्रिय विद्यार्थी राजीव पढ़ने में बहुत ही होशियार था।

​इस कारण वह मास्टर साहब और उनकी पत्नी दोनों का प्रिय था। चूँकि मास्टर साहब की कोई संतान न थी, तो वह हमेशा राजीव जैसे होनहार बच्चे को अपने बेटे की तरह लाड करते थे। उनकी पत्नी तरह-तरह के व्यंजन उनके लिए बनाती थीं और अपने हाथों से ही उसे खिलाती थीं।

​मास्टर जी की कक्षा में रमेश भी था जो पढ़ने में औसत से भी कम था। समझाने के बावजूद भी वह कम समझता था। मास्टर जी को लगता था कि शायद यह मेहनत नहीं करता, वह उसे हमेशा डाँटते रहते और कहते— "तू मेरी कक्षा का सबसे खोटा सिक्का है, जो नहीं चलेगा। मेहनत कर, नहीं तो सच में खोटा सिक्का बन जाएगा।"

​रमेश चुपचाप मास्टर जी की डाँट सुन लेता और कोशिश करता कि मास्टर जी उससे खुश रहें, पर ऐसा कभी न हुआ। समय धीरे-धीरे बीतता गया। सभी विद्यार्थी आगे की पढ़ाई के लिए शहर की ओर चले गए। धीरे-धीरे मास्टर साहब की उम्र भी बढ़ती गई और वह स्कूल से रिटायर हो गए।

​उम्र ने उनको बहुत सारी तकलीफें भी दे दीं। एक दिन शहर जाकर इलाज कराने की बात हुई, पर मास्टर साहब का शहर में कोई अपना नहीं था। अब मास्टरनी जी की उम्र भी हो गई थी, इसलिए वे चाहते थे कि कोई परिचय वाला शहर में मिल जाए तो सहूलियत होगी।

​तभी उन्हें गाँव में किसी ने बताया कि उनका प्रिय विद्यार्थी राजीव शहर में ही है और बैंक में एक अच्छे पद पर है। राजीव का नाम सुनते ही मास्टर साहब की आँखों में चमक आ गई। उन्होंने उसका पता लिया और शहर की ओर चल पड़े। रविवार का दिन था, घंटी बजाते ही राजीव ने दरवाजा खोला।

​पहले तो वह मास्टर जी को पहचान ही नहीं पाया। परिचय देने पर उसने बेरुखी से कहा, "ओह! आप बता के आए होते।" मास्टर जी ने कहा, "बेटा, बड़ी मुश्किल से ढूँढते हुए आया हूँ। तुम्हारा कोई न. तो था नहीं?"

​राजीव ने उन्हें अंदर तो बुलाया, पर राजीव की पत्नी और बच्चों का व्यवहार देखकर मास्टर जी को वो पुराने दिन याद आ गए जब वे राजीव की सेवा करते थे।  परिचय होने पर पत्नी ने चाय की प्याली बिना मन के टेबल पर रख दी। फिर उसने राजीव को अंदर बुलाकर कहा, "इतना बड़ा शहर है, यहाँ मेहमान कब तक रहेंगे? मैं इनकी सेवा नहीं कर सकती।"

​राजीव ने कहा  कि "  खुद ही आए हैं तो क्या करूँ? भगा तो नहीं सकता।" चलो पहले पूछते हैं क्यों आए थे "? जब  दोनों ने कमरे के बाहर आकर देखा तो चाय और बिस्किट वैसे ही टेबल पर पड़े थे। मास्टर साहब  वहाँ से चुपचाप निकल गए। मास्टर जी वापस स्टेशन पहुँचे और मास्टरनी जी से कहा, "वापस चलो, यहाँ कोई अपना नहीं। राजीव जब छोटा था तो कितने स्नेह से उसे पढ़ाते थे, खिलाते थे, पर आज जब वह बड़ा हो गया तो उसने एक दिन के लिए भी हमें सम्मान नहीं दिया। ऐसी जगह नहीं रहना, हम गाँव में ही इलाज करेंगे।"

​तभी एक आदमी ने अचानक आकर उनके पैर छुए। अनजान शहर में और जब मन दुखी हो, तब अचानक कोई पाँव छुए तो आश्चर्य की सीमा नहीं रहती। मास्टर जी ने भावुक होकर पूछा— "तुम कौन हो भाई?"

​उसने कहा, "मास्टर साहब, आपने मुझे नहीं पहचाना? मैं आपका 'खोटा सिक्का'।"

​मास्टर जी ने चश्मा ठीक करते हुए सामने वाले व्यक्ति को पहचानने की कोशिश की। एकाएक उनके मुँह से निकल पड़ा— "रमेश!"

​रमेश ने कहा, "जी मास्टर साहब, आप लोग यहाँ कैसे?" मास्टर जी ने बताया कि वे शहर में इलाज के लिए आए थे। रमेश ने बीच में ही बात काटते हुए पूछा, "इलाज हो गया?" मास्टर जी बोले, "यह शहर बहुत बड़ा है, पर हमारा कोई अपना नहीं। इतनी भीड़ में भी कोई अपना नहीं मिल सकता।"

​तब रमेश बोला, "कैसी बात कर रहे हैं मास्टर साहब? मैं इसी शहर में रहता हूँ और एक सरकारी अस्पताल में क्लर्क हूँ। खोटा सिक्का था, पर इतना तो चल ही पाया।" यह कहते हुए वह हँसने लगा।

​रमेश ने आग्रह किया, "आप मेरे घर चलिए।" मास्टर  जी बोले, "नहीं बेटा, हम किसी पर बोझ नहीं बनना चाहते।" रमेश भावुक होकर बोला, "कैसी बात कर रहे  हैं?  मास्टर साहब, आपने हमें कितनी मेहनत से पढ़ाया। आपकी डाँट-फटकार की वजह से ही तो मैं जीवन जीने लायक बन पाया। जब आपने हमें बच्चों की तरह माना, तो आप भी तो हमारे माता-पिता समान हुए। यह तो आपकी गुरु-दक्षिणा चुकाने का एक छोटा सा मौका है या यूँ कहूँ कि आभार व्यक्त करने का अवसर। आप चलिए।"

​मास्टर जी उसके आग्रह को टाल न सके और उसके घर आ गए। रमेश की पत्नी ने जब उनका परिचय पाया तो तुरंत झुककर उनके पैर छुए और उनके लिए चाय-नाश्ते की व्यवस्था की। रमेश ने उसी अस्पताल में मास्टर साहब का इलाज शुरू करवाया जहाँ वह काम करता था। धीरे-धीरे रमेश और उसकी पत्नी की सेवा से मास्टर साहब पूरी तरह स्वस्थ हो गए।

​एक दिन उन्होंने रमेश से गाँव वापस जाने की बात कही। रमेश ने आँखों में आँसू भरकर कहा, "मास्टर जी, मेरे माता-पिता का स्वर्गवास हो चुका है। यदि आपकी कोई संतान नहीं है, तो मुझे भी तो माता-पिता का सुख नहीं... तो क्या आप मुझे अपना बेटा मानकर यहाँ नहीं रह सकते?"

​रमेश की बात सुनकर मास्टर जी भाव-विभोर हो गए और बोले, "बेटा, तुम्हें तुम्हारी माँ और बाप ने बहुत अच्छे संस्कार दिए हैं। तुमने हमारी इतनी सेवा की, यह बहुत है। अब हमें जाने दो। कभी हो सके तो मुझे माफ कर देना, क्योंकि मैं तुम्हारा गुरु था पर आज तुमने मुझे सिखाया कि सच्ची शिक्षा संस्कारों में है। चाहे व्यक्ति जीवन में कम ही सफल हो, पर उसमें संस्कार जरूर होने चाहिए। भाई, तुम खोटा सिक्का नहीं, तुम तो खरा सोना हो बेटा।"

​रमेश ने कहा, "नहीं मास्टर साहब, आप क्या कह रहे हैं? आपकी डाँट-फटकार तो हमारे भले के लिए थी। जीवन भर आप ही मेरे गुरु रहेंगे। अगर आप मेरे लिए कुछ करना चाहते हैं, तो बस अपना आशीर्वाद हमेशा मेरे ऊपर रखिए और हमारे साथ ही रहिए। आपका बड़ा उपकार होगा। आप यहाँ रहेंगे तो मैं समझूँगा कि खोटा सिक्का चल गया।"

​मास्टर साहब रमेश के इस त्याग और श्रद्धा को मना न कर सके। मास्टर जी और रमेश दोनों का परिवार आज पूरा हो गया था। रमेश के लिए मास्टर साहब का आशीर्वाद और मास्टर साहब के लिए रमेश का साथ,  और अपनापन।

Comments

Popular posts from this blog

पहचान

सेवानिवृति

बड़े लोग