अपमान

 


​सौम्या एक हंसमुख, शिक्षित और अध्यापन से प्रेम करने वाली एक स्कूल शिक्षिका थी, जिसकी आँखों में प्रशासनिक अधिकारी बनने का सपना था। सौम्या पढ़ाई के साथ-साथ सिविल सर्विसेज की तैयारी भी कर रही थी। एक दिन उसके घर एक ऐसा रिश्ता आया जिसे कोई मना नहीं कर पाया और करता भी कैसे, क्योंकि ऐसा रिश्ता तो नसीब वालों को ही मिलता है।

​लड़का अमित एक आई.पी.एस. ऑफिसर था और देखने में भी बेहद खूबसूरत। उसके माता-पिता को सौम्या की सादगी भा गई थी। सौम्या इतनी जल्दी विवाह के लिए तैयार नहीं थी, पर लड़का इतना अच्छा था कि उसकी एक न चली और उसका विवाह हो गया। सौम्या ने नई जिंदगी की नियति मानकर खुशी-खुशी अपने नए संसार को अपना लिया, पर उसकी सादगी अभी भी वही थी।

​अमित ने उसे कई बार टोका कि "आई.पी.एस. की बीवी हो, थोड़ा ढंग से रहा करो," पर सौम्या अभी भी अपनी सादगी वाली साड़ी और साधारण मेकअप में ही रहती। अमित का ट्रांसफर दूसरे शहर में हुआ। ऑफिस में उसके सम्मान में एक शानदार पार्टी दी गई। सौम्या ने वहाँ सबका स्वागत किया। तभी किसी ने अमित से कहा, "अरे भाई, भाभी तो बहुत सिंपल हैं, आई.पी.एस. ऑफिसर की बीवी नहीं लगतीं।" अमित ने हंसते हुए जवाब दिया, "क्या करूं, ऐसी औरतें घर के कामकाज के लिए ही उपयुक्त होती हैं।"

​सौम्या को यह बात बहुत बुरी लगी पर वह चुप रही। सबके जाने के बाद उसने अमित से पूछा, "अमित आपने ऐसा क्यों कहा कि 'ऐसी औरतें'? ऐसी औरतों से आपका क्या मतलब था?" अमित ने इसे मजाक में टालने की कोशिश की और कहा, "अरे बुरा लगा? भूल जाओ इसे।"

​एक दिन अखबार में यू.पी.एस.सी. का आवेदन देखकर सौम्या की दबी अभिलाषा फिर जाग गई और उसने आवेदन कर दिया। अमित को जब यह पता चला तो वह आगबबूला हो गया। उसने सौम्या से कहा, "तुम्हारी इतनी हिम्मत... अपने मन की करने की!" और गुस्से में उस पर हाथ उठा दिया। सौम्या बेहोश होकर गिर गई। अमित ने घबराकर डॉक्टर को फोन किया। डॉक्टर ने जाँच के बाद बताया कि सौम्या गर्भवती है।

​होश में आते ही अमित ने सौम्या से माफी मांगने के बजाय कहा कि "अब वह बिल्कुल भी सिविल सर्विसेज की बात नहीं करेगी और अगर ऐसा करना है, तो वह घर छोड़कर चली जाए।" सौम्या ने उसी सुबह कुछ कपड़ों के साथ घर छोड़ दिया। अनजान शहर में उसने एक कमरा किराये पर लिया और छोटे स्कूल के बच्चों को पढ़ाने लगी।

​दिन गुजरने लगे और नौ महीने बाद सौम्या ने एक खूबसूरत, स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया, जिसका नाम उसने ' आरव' रखा। उसकी मकान मालकिन मौसी ने इस दौरान उसका काफी सहयोग किया। अब सौम्या ट्यूशन और बेटे की जिम्मेदारी के साथ-साथ अपनी सिविल सर्विसेज की तैयारी भी कर रही थी। कभी-कभी जब आरव रात में जगा देता, तो दिनभर के काम के बाद सौम्या की हिम्मत जवाब दे जाती, पर आरव का चेहरा उसे फिर से पढ़ाई में जुटने की ताकत देता।

​एक साल के बाद जब रिजल्ट आया, तो वह मात्र दो नंबर से परीक्षा में सफल नहीं हो सकी। एक पल को उसे लगा कि सारी मेहनत और संघर्ष व्यर्थ गया, पर गहरी सांस लेकर उसने खुद से कहा, "नहीं, इतनी जल्दी हार नहीं माननी।" उसने फिर से जी-जान लगा दी। मोबाइल पर लेक्चर, किताबें और नोट्स—उसने खुद को पूरी तरह झोंक दिया। उसकी कड़ी तपस्या का नतीजा भी उसके हक में आया और इस बार वह इंटरव्यू के लिए चयनित हो गई।

​सफलता के बाद उसे पहली पोस्टिंग उसी शहर में मिली जिसे वह छोड़कर आई थी, जहाँ अमित रहता था। ऑफिस में नए डी.एम. के स्वागत की बड़ी तैयारियाँ थीं। सभी अधिकारियों ने सौम्या से मुलाकात की, जिनमें अमित भी शामिल था। उसने हाथ जोड़कर कहा, "वेलकम मैम।" जवाब में सौम्या ने भी सिर्फ एक सधी हुई मुस्कुराहट के साथ कहा, "थैंक्यू ऑफिसर।"

​अगले दिन ऑफिस में सौम्या का बेटा आरव भी आया। अमित उसे देखकर रह नहीं पाया और सौम्या से पूछ ही लिया, "यह बच्चा कौन है?" सौम्या ने शांति से जवाब दिया, "यह तुम्हारा ही बच्चा है। जब मैं घर से निकली तो गर्भवती थी याद है न तुम्हे?"

​अमित ने  कहा, " सब याद है पर मेरा अहंकार आड़े आ रहा था। खबर तो मिली थी मुझे, पर अहंकार ने रोक लिया।" सौम्या ने कहा  "कोई बात नहीं अमित, यह मेरा बेटा है... क्या मैं इससे मिल सकता हूँ?" सौम्या ने कहा, "क्यों नहीं, आखिर तुम्हारा बेटा है। पर आरव की जिंदगी में आप उसकी मर्जी से ही शामिल होंगे। उसने जब भी पिता के बारे में पूछा, मैंने यही बताया कि वे एक बड़े ऑफिसर हैं और काम की वजह से दूसरे शहर में रहते हैं।"

​सौम्या के चेहरे पर कोई रोष या शिकायत नहीं थी। अमित ने पछताते हुए पूछा, "सौम्या, तुम्हें मुझसे कोई शिकायत नहीं?" सौम्या ने कहा, "कैसी शिकायत अमित? आज मैं जो कुछ भी हूँ, आपकी वजह से हूँ। अगर आपने उस दिन मेरा अपमान न किया होता, तो यह सब शायद कभी न हो पाता। मैं तो अपनी उसी छोटी सी दुनिया में खुश थी।"

​अगली सुबह अमित आरव से मिला। वह अब एक अच्छे पिता की तरह रोज आरव को वक्त देने लगा, उसके साथ खेलता और उसे स्कूल छोड़ने जाता। वह शायद बरसों की कमी को चंद दिनों में भरना चाहता था। एक दिन उसने हिम्मत जुटाकर सौम्या से पूछा, "सौम्या, क्या हम पुरानी बातों को भूलकर फिर से एक साथ नहीं रह सकते?"

​सौम्या ने गरिमा के साथ जवाब दिया, "नहीं अमित। जब मैं तुम्हारी पत्नी बनकर खुश थी, तब तुमने ही मुझे बताया था कि एक आई.पी.एस. की बीवी होने के अलावा मेरी कोई पहचान नहीं है। अब जब मेरी अपनी एक पहचान है, तो तुम चाहते हो कि मैं अपनी पुरानी पहचान के साथ वापस आ जाऊं? आरव तुम्हारा बेटा है, उसकी कोई गलती नहीं, इसलिए मैंने उसे पिता से दूर नहीं किया। पर एक औरत अपने अस्तित्व का अपमान नहीं भूलती। हम अच्छे माता-पिता तो हो सकते हैं ताकि आरव  को हमारी गलतियों की सजा न मिले, पर पति-पत्नी नहीं।" अमित चुपचाप सिर झुकाकर वहाँ से चला गया।

​उस साल अमित और सौम्या दोनों को उनकी उत्कृष्ट सेवाओं के लिए पुरस्कृत किया गया। समारोह में एक रिपोर्टर ने सौम्या से पूछा, "मैडम, आपकी सबसे बड़ी ताकत क्या थी जिसने आपको इस मुकाम तक पहुँचाया?" सौम्या ने गर्व से उत्तर दिया, "अपमान।" वहाँ मौजूद सब लोग सन्न रह गए। सौम्या ने बात पूरी करते हुए कहा, "जी हाँ, अपने अपमान को अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लीजिये, फिर दुनिया में कोई आपको हरा नहीं सकता। दुखी होने के बजाय अपमान से सीखिये। सफलता के जरिए दिया गया जवाब, किसी भी अन्य जवाब से श्रेष्ठ होता है।"

Comments

  1. इस कहानी में भावनाओं की अभिव्यक्ति कुछ अलग ढंग से की गयी है जिससे कहानी घिसे पिटे ट्रेंड से कुछ अलग है। ये इसकी सुंदरता की एक और वजह है। कहानी में बहाव है।
    भाषाई सौंदर्य भी है। सौम्या काअपने मान की रक्षा करने का तरीका उसे घमंडी नहीं एक स्वाभिमानी व्यक्तित्व प्रदान करता है इसलिए कहानी उत्कृष्टता के साथ बयान की गई है।

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

पहचान

सेवानिवृति

बेटी