आस्था

 


​आस्था का नाम तो आस्था था पर उसमें ईश्वर में कोई आस्था नहीं थी। ऐसा नहीं कि वह नास्तिक थी पर व्रत त्योहार, पूजा पाठ मंदिर में उसकी कोई रुचि नहीं थी। रुचि थी तो बस कर्म में वह काम को ही पूजा मानती थी।

​माँ हमेशा कहती थी बेटा कर्म में आस्था अच्छी बात है पर थोड़ी आस्था ईश्वर में भी होनी चाहिए। कोई एक ऐसी शक्ति है जो हमें बुराई से बचाती है हमारी मदद करती है पर  आस्था सब  सुनकर अनसुनी कर देती। माँ ने अब कहना ही छोड़ दिया।

​एक दिन ऑफिस में उसकी नाईट शिफ्ट थी। रात में सिर्फ दो लोग ही बचे थे। ड्राइवर बीमार था इसलिए कैब की सुविधा भी नहीं थी। पहले तो आस्था ऑफिस जाने से हिचकिचाई लेकिन फिर उसने सोचा कि ऑटो तो मिल ही जायेगा। ऑफिस काफी दूरी पर था इसलिए वह  खुद की गाड़ी से भी नहीं जा सकती थी। ऑफिस की  शिफ्ट की रात के दो बजे  वह घर के लिए ऑफिस से निकली। हालांकि रास्ता सुनसान था पर आस्था को लगा ऑटो  तो मिल ही जायेगा न उसने किसी को फोन किया न घर वालों को। वह पैदल ही आगे बढ़ने लगी कि  हो सकता है थोड़ी दूर पर सवारी मिल जाय।

​यह उसका पहला अनुभव था जब वह रात में अकेले बिना किसी साधन के रोड पर चल रही थी। थोड़ी दूर चलने के बाद उसने रोड के किनारे कुछ लोगों का झुंड देखा जो नशे में थे। रात के दो बजे सुनसान  सड़क पर नशे में युवकों का झुंड। कभी न डरने वाली आस्था का विश्वास आज डगमगा गया। उसे लगा कि लड़के उसे ही देख रहे हैं। उसका मन अनहोनी भय से डर गया था। उसका दिमाग काम करना बंद कर दिया था। रात के दो बजे फोन  भी किसके पास में मिलायें। निर्णय तो उसे लेना था। उसे अपने दिमाग में चीख सुनाई दे रहा था। फिर भी साहस करके आगे बढ़ी जा रही थी। तभी अचानक पीछे से दाहिने तरफ से काले रंग की गाड़ी से एक बहुत ही हैंडसम लड़का उसके पास आकर रुक गया। वह डरकर पीछे हो गई  उसने उसे लिफ्ट देने की पेशकश की। आस्था ने उसे मना कर दिया और आगे बढ़ गई।

​थोड़ी देर बाद वह गाड़ी फिर उसके सामने आकर रुकी। लड़के ने कहा- "मैडम काफी रात हो गई है। सुनसान सड़क है कुछ हो गया तो ?चलिए आप मेरी गाड़ी में बैठ जाइये।" आस्था को मदद की जरूरत तो थी पर वह उस लड़के को जानती नहीं थी और एक बार मना करने पर वह दुबारा आया। इसलिए वह डर गई। उसे लगा कि कही  हाथ पकड़कर अंदर खींच ना ले  कार के  अंदर और फिर सुनसान सड़क पर वह क्या करेगी? आस्था इतनी डर गई कि उसे पुलिस हेल्पलाइन या अन्य किसी बात का ध्यान ही नहीं रहा बस लग रहा था कि उस लड़के से पीछा कैसे छुटे?

​तभी अचानक उसने देखा थोड़ी दूरी पर एक मंदिर है जो सड़क किनारे था। वह लड़के को बिना जवाब दिये तेजी से उस मंदिर के पास जाकर हनुमान जी की प्रतिमा के सामने खड़ी हो गई। वह लड़का चला जाता है। हो सकता है  वह लड़का मदद  भाव से उसे मदद के लिए कह रहा हो पर जमाने में किसी पर भरोसा भी नहीं।  कुछ समझ समझ नहीं आता तो भगवान याद आते हैं। और वह तो खड़ी भी  थी भगवान के सामने । अनायास ही उनके मन से निकल पड़ा "हे भगवान रास्ता दिखाओ।" नहीं तो  मैं रात यही खड़ी रह जाऊंगी पर आगे नहीं जाऊंगी"।

​दो से चार सेकंड भी नहीं बीते कि उसकी नज़र रोड किनारे रखे डस्टबिन पर गई जहाँ एक आदमी थाली से जूठन फेंक रहा था। पता नहीं उसे क्या लगा कि इतनी रात में जो खाना फेंक रहा है वह यहीं आसपास का रहने वाला होगा। पर तो मन की अब क्या?  आगे कुआँ पीछे खाई वाली स्थिति। फिर भी वह हिम्मत करके उस आदमी के पास गई और पूछा "भैया रात में कोई साधन  नहीं मिलता है क्या?" उस आदमी ने कहा "मैडम मिलता तो है पर हो सकता है दो बज रहे हैं तो ना मिले। थोड़ी दूर करीब आधा किलोमीटर आगे जाने पर शायद मिल जाये पर आप रात में अकेले यहाँ क्या कर रही हैं?"

​आस्था ने उसे ऑफिस से लेकर गाड़ी वाली लड़के तक की सारी बात बता दी। फिर बोली "भैया अब आगे जाने की हिम्मत नहीं हो रही अकेले। इसीलिए पूछा कि साधन नहीं मिलते क्या?" उस आदमी ने कहा- "मैडम मैं यहीं पास में रहता हूँ। आज ऑफिस से देर हो गई खाना ज्यादा था तो पास बाहर डाल रहा हूँ। मेरे पास बाइक है अगर आप चाहें तो मैं आपको कुछ दूर छोड़ सकता हूँ जहाँ आपको कोई न कोई साधन मिल जायेगा और आप घर पहुँच जायेंगी।"

​आस्था के सामने फिर वही प्रश्न क्या? करे रात  का समय और अनजान व्यक्ति। लेकिन खुद के  मदद के लिए हाथ  नहीं बढ़ाया न  कोई दबाव बनाया। आस्था को लगा अगर बाइक से कुछ किया तो कूद जाऊंगी पर इज्जत तो  बच जाऊंगी। फिर उसने हनुमान जी  की मूर्ति की तरफ देखा और कहा "भगवान तुमने रास्ता दिखाया है अब तुम पर ही सब कुछ छोड़ती हूँ।"

​धन्यवाद कहते हुए बसने उस आदमी की मदद स्वीकार की और पीछे बैठ गई। थोड़ी दूर पर भी  कोई साधन उपलब्ध नहीं था इसलिए उस आदमी ने कहा "मैडम आपको घर ही छोड़ देता हूँ क्योंकि अभी भी बात तो वही है कि रात का समय और अकेला रास्ता।"  आस्था ने उसे घर से  पहले ही रुकने को कहा और धन्यवाद देते हुए घर की तरफ गई।

​घर जाकर उसने माँ को सारी बात बताई। आस्था ने कहा "माँ तुम सच कहती हो ईश्वर है। कोई शक्ति है जो हम सबको चलाती है। फिर आज जब मैं पूरी तरह शरणागत हुई तो उन्होंने तुरंत एक नेक इंसान को मदद के लिए भेज दिया।" माँ ने कहा "सही बात है बेटा!  अच्छी बात है कि तुम खुद समझ गई। मैं कहती थी ना कि एक दिन तुम खुद यह अनुभव करोगी। सच्चे मन से प्रार्थना करने पर वह पूरी होती है । आज मेरी आस्था की आस्था उस शक्ति में हो गई जो हम सबको चलाती है।"

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