बेटी
कहा जाता है कि बेटियां लक्ष्मी रूप होती है और जिस घर में बेटियां लक्ष्मी रूप होती हैं और जिस घर में बेटियां होती हैं वह घर सौभाग्यशाली होता है पर आज भी कहीं ना कहींलोगों के मन मे बेटों की चाह रहती ही है पर मेरा मन सदा ही बेटियों को चाहता था। पर मुझे एक बेटी का पिता बनने का सौभाग्य प्राप्त न हो सका।
दो बेटे दोनों पढ़ लिखकर अपनी अपनी दुनिया में खुश थे घर में बच्चे बस में और मेरी श्रीमती जी। सरकारी नौकरी से रिटायरमेंट के बाद पेंशन से घर अच्छी तरह चल जाता था पर अकेलापन काटने को दौड़ता था इसलिए एक मेडिकल स्टोर खोल दिया था सारा दिन उसमें रहता था शाम को किसी बगीचे में टहलकर आता था कोई कमी नहीं थी बस बेटी की कमी खलती थी।
एक शाम मेडिकल स्टोर पर एक बिटिया दवा की पर्ची लेकर आई और बोली " अंकल यह दवाई दे दीजिए और पूरा बता दीजिए कितने पैसे देने हैं"। मैंने उसकी ओर देखा। फिर पर्चे को देखा काफी दवाईयां थी और महंगी भी। मैंने बोला " बेटा कुल मिलाकर ₹3000 हुए ।कोई हॉस्पिटल में भर्ती है क्या " "जी मेरी मम्मी का ऑपरेशन हुआ है उन्हीं की दवा है " कहकर दवा लेकर चली गई।
1 सप्ताह बाद वह फिर से आई दवा लेन के लिए अबकी बार मैंने उसे दवा में थोड़ा ज्यादा छूट दे दी ।दवा देने के बाद मैंने उससे सहानुभूति पूर्वक पूछा "तुम्हारी मम्मी कैसी हैं?" "अभी हॉस्पिटल में ही है"।कह कर दवा लेकर चली गई यह सिलसिला करीब दो हफ्ते तक चला दो हफ्तों के बाद उसने बताया मम्मी घर आ गई लेकिन दवा अभी भी 6 महीने तक तक चलेगी डॉक्टर ने कहा है टाइम लगेगा ।
एक दिन जब वह दवा लेने आई मैंने न चाहते हुए उससे पूछ लिया " बेटा हमेशा तुम ही आती हो और कोई नहीं है क्या घर में? ""बहनों की शादी हो गई है और भाई नहीं है "।"यानि तुम ही सब देखती हो ? मेरा मन उस बिटिया के लिए प्यार से भर गया मन में सोचा काश ईश्वर ने हमें भी एक ऐसी प्यारी बिटिया दी होती। वह थी भी बहुत प्यारी। शायद 30 35 की हो पर चेहरे पर मासूमियत और सच की चमक ।।मन में न जाने कितनी बार आया बेटी बोलने को लेकिन बोल ना सका उसका आना दवा ले जाना बस यह छोटी सी मुलाकात मुझे बहुत सकून देती एक अनजाना सा रिश्ता महसूस करने लगा था जो शायद अपनी बेटी से भी ज्यादा था। संघर्षों के बावजूद उसने आत्मसम्मान बनाए रखा और किसी भी तरह की मदद को मना कर देती ।
एक दिन दोपहर के समय पत्नी मायके गई थी दोपहर का सन्नाटा धूप बहुत तेज थी। मैंने सोचा कुछ देर के लिए दुकान बंद करके मैं भी आराम कर लूं मैं जैसे ही उठा इतने में बिटिया दुकान पर आए दवा लेने आ गई उसका पर्चा लेकर जैसे ही दवा लेने उठा अचानक से सीने में तेज दर्द हुआ और मेरे मुंह से आवाज तक नहीं आ रही थी। मेरी हालत देखकर आसपास मदद के लिए पुकारा पर दोपहर का समय कॉलोनी का सन्नाटा उसे कुछ समझ नहीं आया उसने अंदर जाकर मुझे जमीन पर लिटा दिया फिर उसे जैसे समझ आया कि यह हार्ट अटैक
हो सकता है उसने मुझे सीपीआर दिया उसकी मेहनत रंग लाई और मैंने आंखे खोल दी । उसने मुझसे मेरी पत्नी का न.पूछा फिर उसे सारी बात बताई पत्नी का मायका बहुत दूर नहीं था थोड़ी देर में वह आ गई उसके साथ कुछ लोग भी थे। फिर उन सबने मुझे हॉस्पिटल पहुंचाया जहां शाम मैं बेहतर महसूस करने लगा फिर उसने अपने घर फोन किया । शाम को बिटिया अपने घर चली गई। उसकी मां भी तो घर में अकेली थी। दूसरे दिन मेरे बेटे बहु सब हॉस्पिटल आ गए और बिटिया भी मेरा हाल-चाल लेने आई। डॉक्टर ने कहा एक-दो दिन में छुट्टी भी जाएगी। हार्ट अटैक ही था पर सही समय पर अस्पताल आने से और प्राथमिक उपचार मिलने से मेरी जान बच गई । 2 दिन बाद में घर आ गया मैं पत्नी को सारी बात बताई और उसे बिटिया को भी घर बुलाया उसका आभार व्यक्त करने के लिए लेकिन उसने कहा " यह तो मेरा फर्ज था" " बड़े अच्छे संस्कार दिए हैं बेटा तुम्हें तुम्हारी मां ने हम सब तुम्हारी मां से जरूर मिलेंगे "और मैने उस दिन बोल ही दिया " बेटी आज से तुम मेरी बेटी जैसी और तुम्हें देखकर वैसे भी मन में इच्छा कई बार आई कि तुम्हें बेटी कहूं पर नहीं कहा तुमने मेरी जान बचाई और बेटी होने का फर्ज़ निभाया इसलिए आज से तुम मेरी बेटी"।
फिर हम तीनों उसके घर गए और उसकी मां की तबीयत पूछा उनका आभार व्यक्त किया । मैने उनकी मां को बताया कि आज से उनकी बेटी हमारी भी बेटी जैसी।बिटिया ने खुशी से चहकते हुए कहा "पहले सिर्फ मेरी मां थी अब मेरे पास दो मां और पिताजी भी हो गए "। इस नए रिश्ते ने हम तीनों के जीवन की कमी को पूरा कर दिया।
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