भगवान
नंदिता और अर्चना बहनें थी मगर सौतेली।
नंदिता की माँ की मृत्यु के बाद पिता ने दूसरी शादी
कर ली। नाम के अनुरूप ही सौतेली माँ का व्यवहार सौतेला ही था नंदिता के लिए अलग अर्चना के लिए अलग।दोनों बच्चों में बहुत भेद करती थी
यहाँ तक कि नंदिता को स्कूल के लिए टिफिन भी नहीं देती थी। नंदिता को इन सब बातों
से कोई शिकायत भी नहीं थी घर का काम और पढाई बस वह अपनी दुनिया में खुश रहती।
पिता नौकरी के लिए बाहर रहते थे। जब घर आते तो
सौतेली माँ नंदिता के साथ अच्छा व्यहार
करतीं थी और उनके जाते ही फिर से पुराना रवैया।
नंदिता पढ़ने में बहुत अच्छी थी पर उसकी सौतेली माँ को यह बात भी नागवार
गुजरती क्योंकि उनकी बेट अर्चना पढ़ने में अच्छी नहीं थी इसलिए नंदिता के 12th पास करते ही उसकी सौतेली
माँ ने पिता से कहा 'सुनो ज्यादा पढाने लिखाने पर लड़के अच्छे नहीं मिलते दहेज़ भी
देना होता है हम कहा से इतने पैसे लायेंगे ?मेरे पास एक रिश्ता है लड़का अच्छा है पर गरीब है दान दहेज़ का भी लफड़ा नहीं। नंदिता की शादी कर
देते है। नंदिता के पिता भी राजी हो गये
और नंदिता ने इसे किस्मत मानकर चुप-चाप शादी कर ली।
नंदिता का पति बहुत अच्छा इंसान था वह
जानता था कि नंदिता आगे पढ़ना चाहती थी पर उसकी शादी हो गयी। उसने नंदिता से कहा ' तुम जो करना चाहती हो करो
, मैं तुम्हारे साथ
हूँ मैं तरह से तुम्हारी सहायता करूंगा ' ' नहीं मुझे नहीं पढ़ना 'नंदिता ने कहा। ' देखो मैं तो बहुत ज्यादा
पढ़ा नहीं हूँ पर पढाई की कीमत समझता हूँ , जो मुझे न मिल सका वह तुम
करो मुझे ख़ुशी होगी ।'' ठीक है अगर आप चाहते है तो मैं पढूंगी ' , उसके पति किशोर ने उसका
ग्रेजुएशन पूरा कराया बाद में सिविल सर्विसेज की तैयारी करवाई। रात-दिन एक कर दिया
पत्नी को आगे बढ़ाने में और नंदिता की
मेहनत रंग लायी और नंदिता का चयन सिविल सेवा की परीक्षा में हो गया और डीएम के रूप में उसकी नियुक्ति दुसरे शहर में हो गयी। काम की आपाघापी और नयी नौकरी
के कारण वह घरवालों से ज्यादा बात नहीं कर पाती थी। उसके पति को भी अब लगने लगा कि वह नंदिता के लायक नहीं है इसलिए
वह नंदिता की ज़िन्दगी से दूर चला जायेगा
शहर ही छोड़ देगा पर यह सब करने से पहले वह एक बार नंदिता को देखना चाहता था
इसलिएवह उस शहर गया जहा नंदिता की पोस्टिंग थी।
काफी प्रयत्नो के बाद भी जब उसे नंदिता से मिलने में सफलता ना मिली तो वह
और भी मायूस हो गया।
एक दिन सूचना मिली की डीएम साहिबा शहर में गरीबो को कम्बल
बांटेगी। नियत समय पर वह भी मुँह ढक कर कम्बल लेने वाले स्थान पर चला गया। नियत
समय पर नंदिता यानि डीएम साहिबा आती है और कम्बल
वितरण का कार्य शुरू करती है। जब बारी किशोर की आती है
तो पीछे वाले व्यक्ति के धक्का लगने के कारण वह नंदिता से टकरा जाता है और उसके
मुँह से निकल पड़ता है 'माफ़ कीजिएगा मैडम, गलती हो गयी ' नंदिता को आवाज जानी-पहचानी लगती है वह किशोर
से कहती है कि 'मुँह खोलो’ किशोर ऐसा नहीं
करना चाहता था पर डीएम साहिबा की बात मना भी कैसे कर सकता था तो उसे मुँह खोलना पड़ा किशोर को देखते ही नंदिता आश्चर्य से बोली 'आप' फिर वह अपने जूनियर को कम्बल वितरण का कार्य करने को कह के निकल जाती है और किशोर से पूछती है ' आपने बताया क्यों नहीं और यहाँ आप का फ़ोन नंबर
भी नहीं लग रहा और मेरा नंबर खो गया था जब आयी तभी दूसरा लिया इसलिए बात
ही नहीं हो पायी। 'नंदिता अब मैं तुम्हारे लायक नहीं बस आखिरी बार मिलने आया
हूँ 'आप ' ऐसा क्यों कह रहे है आप मेरे साथ घर चलिये वहाँ
बात करते है और वह किशोर को साथ लेकर घर आती है सबसे परिचय कराती है और
किशोर से बोली है 'आप मेरे पति है जो भी हूँ आप के कारण हूँ आप ऐसा क्यों कह
रहे है ' ' पर तुम्हारे घर के नौकर
भी मुझसे ज्यादा पढ़े-लिखे होंगे शायद ' ऐसा रिश्ता ठीक नहीं है यह उनका काम है हमारा रिश्ता है इतने सालो का। मेरे पद से उनका कोई लेना- देना नहीं और मैं तो आप ही
का सपना पूरा कर रही हूँ ना ? तो ऐसी बात क्यों
?"मुझे कोई परेशानी नहीं तो आप ऐसी बात ना करिये
घर से सबको बुलाये अब हम यही साथ रहेंगे ' नंदिता के इस व्यवहार को देखकर किशोर की आखो में ख़ुशी के
आँसू निकल आये भरे गले से बोलै 'तुम आज भी वैसी
ही हो 'पर आप बदल गये ' नंदिता ने हँसते हुए मजाक किया ' पर अब मैँ ऐसा नहीं होने दूँगी 'पहले मैंने आपकी बात मानी अब आप मेरी माने और सबको यहाँ बुलाये। सबके आने के बाद नंदिता ने सबको शहर दिखाया
शॉपिंग करायी और एक पार्टी का आयोजन कर अपने परिवार का परिचय सबसे करवाया। परिचय
में उसने पति सास -ससुर सबके लिए एक ही शब्द का सम्बोधन किया ' भगवान ' मैं जो भी हूँ पर ये मेरे भगवान है और इनके
कारण ही मैं आज यहाँ हूँ ' नंदिता के
सास-ससुर ने उसे ढेरो आर्शीवाद दिया और पार्टी में नंदिता की विनम्रता और सादगी की
चर्चा हो रही थी।
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