उपहार
पार्टी में बहुत चहल-पहल थी। पूरा होटल शहर के रईस व्यापारी मिस्टर आहूजा ने बुक कर लिया था केवल रेस्टॉरेंट छोड़कर
क्योकि उन्होंने देश के कोने -कोने से प्रसिद्ध हलवाई बुलवाये थे जो अपने प्रदेश के खानों के लिए मशहूर थे । मिस्टर आहूजा अपनी इकलौती बेटी
की पाँचवी सालगिरह पर कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते थे। पार्टी में आने वाला हर मेहमान
वी. आई. पी. केटेगरी में आने वाले लोग थे। उनके साथ उनके बच्चे भी सभी पार्टी में अपनी
-अपनी तरह से व्यस्त थे। बच्चे अपनी आदत के अनुसार
मौज-मस्ती और खाने-पीने के हर सामान को आजमाने की कोशिश कर रहे थे,
और खाने का सामान
लेने के बाद पसंद ना आने पर या थोड़ा खाकर फेंक दे रहे थे। जिस हल में पार्टी चल
रही थी उसके सामने ही होटल का रेस्टॉरेंट था जिसमे डॉ . श्रुति भी आई थी जो शहर की मशहूर बाल चिकित्सिक थी साथ ही समाज सेवा के भाव उनके दिल में
हमेशा ही रहते थे , हमेशा ही वह लोगो की मदद करती रहती साथ ही गरीब बच्चों का ईलाज
भी मुफ्त कर देतीं थीं। वह काफी देर से पार्टी का दृश्य रेस्टोरेंट के अंदर बैठकर देख रही
थीँ। उन्हें मन ही मन अन्न की बर्बादी देखकर बहुत बुरा भी लग रहा था पर वह कर भी
क्या कर सकती थी क्योंकि न तो वह पार्टी में आमंत्रित थी ना ही मिस्टर आहूजा से
कोई पहचान खाना खत्म करके जैसे ही डॉ.
श्रुति रेस्टोरेंट से बाहर निकली
सामने पार्टी हॉल में सन्नाटा सा छा गया संगीत की ध्वनि बंद हो गई और उन्हें बहुत
आश्चर्य हुआ कि अचानक से क्या हो गया ? वह जिज्ञासावश न चाहते
हुए भी पार्टी हॉल की तरफ चल पड़ी । अंदर जाने पर उन्हें पता चले कि जिस बच्ची की
बर्थडे पार्टी है उसे अस्थमा का अटैक आया है।
बच्ची को जमीन से उठाकर कुर्सी पैर लिटाया गया और आनन -फानन में शहर के बड़े
-बड़े डाक्टरों को फोन किया गया । होटल शहर से दूर होने के कारण सभी को समय लग रहा
था। सभी के चेहरे मायूस हो गए थे। बच्ची का माँ
का रो-रो कर बहुत बुरा हाल था। तभी डॉ. श्रुति बच्ची के पास आई और अपना
परिचय देते हुए कहा कि वह शहर में बाल चिकित्सिक हैं यह कहकर
उन्होंने कुछ दवाएँ भी मँगाई और बच्ची की प्राथमिक चिकित्सा शुरू केर
दी। थोड़ी देर बाद बच्ची ने आँखे खोल दी।
काफी देर तक बेहोश होने के कारण उसे याद
ही नहीं था कि क्या हुआ ? उसने अपनी मम्मी से पूँछा
सब लोग इतने शांत क्यों है, म्यूजिक क्यों नहीं चल रहा?
मम्मी ने आँसूँ पोछते हुए कहा कुछ नहीं बेटा और हॉल फिर पहले की भाँति हो
गया। मिस्टर आहूजा ने डॉ. श्रुति को बहुत
धन्यवाद दिया कि पहचान न होने पर भी
उन्होंने वक़्त पर उनकी सहयता की और बदले में वह उनसे कुछ धनराशि लेने का
आग्रह करने लगे पर डॉ. श्रुति
ने विनम्रतापूर्वक मन कर दिया साथ
ही बोली कि देना चाहते है तो वह दीजिये जो मैं चाहती हूँ .. हाँ -हाँ बोलीये
ना मेरी बच्ची से ज्यादा कुछ भी मेरे लिए '
तो यहाँ पार्टी
में बचा हुआ सारा खाना सामने की बस्ती में
बटवाँ दीजिए साथ ही हर महीने कुछ रकम ऐसी
संस्थाओ को दे दीजिये या आप खुद उनके लिए कुछ करें जो दो
वक़्त की रोटी भी नहीं जुटा पाते और अन्न
की बर्बादी ना हो जैसा इस पार्टी में हुआ , बोलिए ये दे सकते है ?'डॉ. श्रुति आपने
मेरी आँखे खोल दी या यूं कहे मुझे मेरी नैतिक जिम्देदारी का अहसास करा दिया। मुझे
ख़ुशी है कि आप जैसे युवा इस देश में है। जो खुद से ज्यादा अपने समाज और अपने देश के लिए सोचते है आप भी
हमारे और बच्ची के साथ चले और अपने शुभ हाथों से यह खाना लोगों में बाटे साथ ही
मैं खुद महीने में ऐसे जगहो को जहाँ मदद की जरूरत है हर महीने सहायता करूंगा 'मिस्टर आहूजा अब
सही मायने में अब आपकी पार्टी पूरी हुईं
है' डॉ. श्रुति ने कहा 'जी और आपने मेरी
बच्ची को बचाने के साथ -साथ एक नेक काम के लिए मुझे प्रेरणा दी है मैं सदैव आपके
आभारी रहूँगा ' मिस्टर आहूजा ने कहा और एक बार फिर सबने बच्ची
को जन्मदिन की मुबारकबाद दी एक साथ ही और
पूरे हाल हैप्पी बर्थ डे की आवाज से गूँज
उठा। मिस्टर आहूजा की नजरें कृतज्ञता से डॉ. श्रुति की ओर देखे जा रही थी। क्योंकि
उन्होंने ही तो गमगीन माहौल को अपनी
अच्छाइयों से फिर से खुशहाल कर उनकी बच्ची
को जन्मदिन का सबसे बड़ा उपहार दिया जीवन
का उपहार।
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