हक
रश्मि के घर में आने से जैसे चारों ओर खुशियाँ
ही बिखर गयी हो। हर एक की सुख-सुविधा का ध्यान रखना हर काम को बेहतर तरीके से करना
, आस-पास हर कोई
उसका मुरीद हो गया। ससुराल में भी सब ठीक
ही था। बस वो कहते है ना इच्छाओ का अंत नहीं होता चाहे वो इच्छा सही हो या गलत हो
। यही हाल रश्मि के ससुराल वालो का भी था। माँ -बाप ने हैसियत के हिसाब से शादी में ठीक-ठाक खर्च किया था |
पर वह उसके ससुराल वालो को हमेशा कम ही लगता था
। उसकी ननद की शादी में भी उधार के नाम पर
उसके पापा ने पीएफ से ठीक-ठाक रक़म ली। पर
शादी के इतने साल बाद भी वह रक़म वापस नहीं की गई कभी कोई बहाना, कभी कोई बहाना। और चाहते तो ये वह फिर से मायके से कुछ ले ही
आये। रश्मि चुपचाप सब सह लेती कि घर में शांति बनी रहे।
एक दिन अचानक उसके चचरे भाई का फ़ोन आया जो की उसके पिता के साथ ही रहा करता था , कि उनकी तबियत बहुत ख़राब है।इस हॉस्पिटल में
भर्ती है। यह सुनकर रश्मि जोर-जोर से रोने लगी और बदहवास ही बिना किसी से
कुछ बताये हॉस्पिटल की ओर भागी । हॉस्पिटल
से लौटने उसने सबको बताया कि अभी तो पिताजी कि हालत ठीक है।लेकिन दवा में बहुत खर्चा आयेगा और सेवा
करने के लिए भी अब कोई ना कोई हमेशा चाहिए।
इस पर उसकी सास चिढ़ते हुए बोली ' तो तेरा भाई है ना डेरा डाल के बैठा है वह देख
लेगा और पैसे हमारे पास कहाँ जो पिताजी को
दें । 'पर माँ दीदी की शादी के
समय जो पैसा लिया गया था पिताजी से वह तो हम वापस कर ही सकते है ना ' यह सुनकर सास का पारा चढ़
गया ' इतने दिन कि बात
तू अब भी याद किये बैठी है , अरे बेटी की शादी में दिया गया पैसा कौन लेता है भला ? वह उनकी भी तो बेटी जैसी ही है। यह सब सुनकर
रश्मि का मन गुस्से से भर गया लेकिन कुछ सोच कर
वह चुप ही रही। इलाज में बहुत पैसे खर्च हुए।
रश्मि के पिताजी को अपना घर तक बेच देना पड़ा और अब वह एक
छोटे से फ्लैट में रहने लगे । एक दिन रश्मि की ननद का फ़ोन आया उससे बात करने के
बाद सास सीधे रश्मि के पास आयी बोली '
तेरे ननदोई की
जॉब खतरे में है पांच लाख रुपयों की सख्त जरूत है , तेरे पिताजी ने
घर बेचा है और पैसे मिल गए होंगे , तू अपने पिताजी से बात कर
एक बार '' पर माँ
जी .. अभी रश्मि कुछ बोल पाती तभी उसकी
सास बोल पड़ी 'और तू भी उनकी बेटी है जायदाद में तुम्हारा भी
तो हिस्सा है ? कौन सा एहसान करेंगे ? यह कहते हुए वह
वहाँ से चली गयी । शाम को रश्मि के पति ने भी वही बात की। रश्मि ज्वालामुखी सी भड़क
उठी। बोली ' आप सब किस मिट्टी से बने है ?
बस लेने के लिए
रिश्ते जोड़ते है। देने के नाम पर रिश्तों का ध्यान नहीं आता?
' हाँ दीदी मेरे पिता की बेटी जैसी है पर उन्होंने कभी उन्हें अपना पिता माना?
इतनी बीमारी में
क्या किया उनके लिए ?
मैं बेटी हूँ पर
क्या बस लेने के लिए ?मैं भी कुछ नहीं कर पायी उनके लिए । आप सब दिन
भर बस लेने की सोचते है और मेरे भाई को भी कोसते हो कि पूरी जायदाद का वारिस वह है
अकेला लेकिन कितना खर्च हुआ बीमारी में इसका कभी हिसाब लगाया ?
वो बेचारा दिन
रात उनकी सेवा करता है बदले में कभी कोई अधिकार नहीं जताया अगर उसे ईट -पत्थर के
दो कमरे मिल भी जाये तो क्या ज्यादा होगा ?आप लोगो ने मुझे
भी वहाँ नहीं जाने दिया कम से कम कुछ दिन ही रह लेती तो मन को संतोष मिलता कि मैंने भी बेटी होने का
कुछ धर्म निभाया। माँ जी आप भी तो एक बेटी की माँ है। आप को उनकी तकलीफ दिखायी
देती है मेरी नहीं? आप जैसे लोगो की
वजह से ही लोग बेटियां पैदा होने पर दुखी होते है। क्या बेटियाँ सिर्फ लेने के लिए
होती है ? मैं ना तो अब मायके जाऊँगी और ना ही पिताजी से
कुछ कहूँगी क्योंकि जब मैं कुछ कर नहीं
सकती उनके लिए तो उनकी किसी चीज पर मेरा कोई हक़ नहीं । हक़ के साथ जिम्मेदारियाँ भी
होती हैं। तो जो यह जिम्मेदारियाँ निभा रहा है हक़ भी तो उसी का है '
यह कहकर रश्मि
अपने कमरे में चली गयी और सब उसके बदला हुआ रूप देखकर एक दुसरे का मुँह देख रहे थे ।
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