दूसरा कौन?
' माँ मैं स्कूल जा रही हूँ ' ' अच्छा बेटा , नाश्ता कर लिया ? टिफिन रखा या नहीं ' ' ले लिया है माँ ' 'तुम भी रोज -रोज एक ही बात परेशान कर देती हो 'तभी दूसरी आवाज आती है ' आँटी मैं भी जा रही हूँ ' ' तो जा न , कोई एहसान कर रही है क्या ? जा रही हूँ जा रही हूँ , कुछ ना कुछ लगा ही रहता है , कांता जी ने झल्लाहट भरे स्वर में कहा ।
कांता जी की एक ही बेटी थी निशा , जिसका पालन -पोषण करने में प्यार इतना ज्यादा कि वह बिगड़ ही गयी। दूसरी ओर ख़ुशी जिसे जिसे उन्होंने डॉट -फटकार के अलावा कभी प्यार में दो बोल भी ना बोले हो । वह बेहद ही होशियार थी पढ़ने में खेल -कूद में , सभी में भाग भी लेती और प्रथम भी आती।
ख़ुशी को कांता जी के पति तीन बरस की अवस्था में घर लाये थे जो उनके दोस्त की बेटी थी , माँ तो पहले ही दुनिया छोड़ चुकी थी। पिता को भी बीमारी ने कल का ग्रास बना दिया। मरते वक़्त उन्होंने पाँच लाख रुपए और अपनी बेटी अपने दोस्त को सौंपते हुए कहा था 'इसे किसी अनाथालय में डाल देना और जब ये बड़ी हो जाये तो इसकी शादी इन पैसों से कर देना ' तब उनके दोस्त यानि कांता जी के पति ने कहा था ' ये अनाथालय क्यों जाएगी , मेरी एक बेटी है , मै समझूंगा विधाता ने एक और दे दी। तुम चिंता ना करो ' उनके इतना यह कहते
ही ख़ुशी के पिता ने संसार को अलविदा कह दिया , जैसे वह यही आश्वासन चाहते थे कि उनके बाद उनकी बेटी ठीक
से रहेगी।
तब से ख़ुशी
नरेश जी के घर रहने लगी। नरेश जी तो उसे अपनी बेटी ही मानते थे। पर कांता जी हमेशा
ख़ुशी से चिढ़ती थी कि दुसरे कि बेटी ला कर सर
पर मढ़ दी।
समय के साथ
निशा और ख़ुशी दोनों ने कॉलेज में एडमिशन ले
लिया। कॉलेज जाते समय ख़ुशी बोली 'आँटी दो हज़ार रुपये दे दीजिये , किताबे लेनी है '
इस पर कांता जी बोली 'जितने तुम्हारे बाप ने दिए नहीं , उससे जयादा लगा चुके तुम पर
इन बीस सालों में , हर वक़्त डिमांड , नहीं है पैसे मेरे पास ' तभी निशा वहाँ आती और
कहती है ' माँ दो हजार रुपये दे दो आज कॉलेज का पहला दिन है , कॉलेज में पार्टी करूँगी
, तभी तो दोस्तों पर अच्छा इम्प्रैशन बनेगा 'कांता जी ने बिना कुछ कहे तुरंत दो हजार रुपये निकल कर निशा को दे दिया और बोली
' एक ही तो बेटी है मेरी और यही तो दिन है मस्ती के जा बेटी , काम पड़े तो और ले लेना
' .निशा चहकते हुए बाहर चली गयी। ख़ुशी अब भी
खड़ी थी। कांता जी ने उसे घूरते हुए कहा ' तो अभी तक यहीं है ,
गयी नहीं ? बड़ी बेशर्म लड़की है , कितनी बार
बोला पैसे नहीं , फिर भी शर्म नहीं आती ' फिर
गुस्से से उन्होंने पर्स से ५०० रुपये का नोट निकाला और उसकी तरफ फेकते हुए बोली अभी
इतने ही है 'पर इतने से नहीं होगा आँटी जी '
' अरे नहीं होगा तो ना पढ़ , कौन सा कलक्टर बनाना है तुझे ? 'यह सुनकर ख़ुशी रूआंसी होकर चली गयी।
परीक्षा के
बाद रिजल्ट आया निशा ने
माँ का मुँह मीठा कराया ' माँ मैं सेकंड आयी
' कांता जी ने ख़ुशी की तरफ देखत हुए पूँछा
' और तू पास भी हुई या नहीं ' ' आँटी जी मैं
फर्स्ट आयी ' यह सुनकर कांता जी का मिठाई का
स्वाद बिगड़ गया। और गुस्से में बोली ' बस अपनी
ही तरक्की ही दिखती है तुझे ' ' पर अब मैंने क्या किया ' ख़ुशी बोली। निशा ने माँ को चुप कराया 'छोड़ो ना माँ , तुम भी
'
एक दिन ख़ुशी
बोली 'आँटी जी मेरी जॉब लग गयी है, बाहर जा रही हूँ ' कुछ पूछे बगैर कांता जी खुश होते
बोली 'जा पीछा छोड़ , बीस साल बहुत देखा तुझे '
साल बीतते रहे।
अब नरेश जी दुनिया में न रहे। निशा भी जॉब
कर करने लगी। घर पर कांता जी अचानक फ़ोन पर
किसी से बात कर घबरा जाती है। उन्होंने निशा को फ़ोन किया ' बेटा तेरे पापा ने
लोन लिया था , जितना हो पाया मैंने चुका दिया
लेकिन पांच लाख रुपये अभी भी बाकी है , एक
महीने में देना है , नहीं तो घर नीलाम हो जाएगा ' निशा बोली ' आप कैसे बात कर रही हो
, मै क्या कर सकती हूँ ? ' यह कह कर उसने फ़ोन रख दिया।
कांता चिंता
में इधर -उधर टहलने लगी., तभी ख़ुशी वहाँ आती
है ,अचानक उसे देखकर कांता जी पूछ ही लेती है कि वह यहाँ कैसे ? ख़ुशी बताती
है कि उसका ट्रान्सफर हो गया है इसी शहर में
तो उसने सोचा कि मिल ले , इसलिए आयी 'ख़ुशी ने कांता से पूछा ' आप इतनी पेरशान क्यों दिखाई दे रहे
है ?' 'कांता जी ने पूरी बात बता डाली और बोली 'अब कोई आस नहीं दिखता , घर नीलाम हो
जायेगा। ' आँटी जी आप कैसी बातें कर रही है? यह घर चाचा जी ने कितनी मेहनत से बनवाया , अब ये
नीलाम कैसे हो सकता है?'' क्या करूँ ? और कोई चारा नहीं ' आँटी जी मैंने नए घर के लिए
पैसे रखे है वो ले लीजिये , वैसे भी अगर आप लोग ना होते तो मैं आज यहाँ न होती। मेरा सब आप का ही तो है ' नहीं बेटी ' आज पहली बार
कांता जी को खुद पर शर्म आ रही थी , जिसको हमेशा दूसरा समझा , वो तो अपने से भी ज्यादा अपना लगा। तभी तो इतने साल में बेटी शब्द उनके मुँह से निकला।
' तूने इतनी मेहनत से पैसे बचाये घर के लिए ,मैं कैसे ले सकती हूँ ?' अरे मैंने कहा
ना कुछ दिन किराये पर रहकर फिर घर ले लूँगी,
बस आप इस घर को बचाइए ।
कांता जी ने ख़ुशी से माफ़ी मंगाते हुए कहा ' बेटा
मुझे माफ़ कर दो , मैंने हमेशा तुम्हारे साथ गलत बर्ताव किया। लेकिन आज तुम वो कर रही
हो जो मेरी सगी बेटी ने भी ना किया। अभी तुम किराये पर क्यों रहोगी ?, तुम्हारा घर है , मेरे साथ रहो।
वैसे भी मैं अकेली हूँ , तभी मैं पैसे लूँगी और समझूंगी कि तुमने मुझे माफ़ कर दिया
। ' ' लो इतनी सी बात ,नही जाती मैं ' यह कहकर ख़ुशी खिलखिला पड़ी।
कांता जी को
रह रह कर निशा याद आ
रही थी और एक तरफ ख़ुशी थी।
उनके मन में बस यही सवाल आ रह था कि दूसरा कौन?
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