कबाड़

 


अवस्थी जी रिटायरमेंट के बाद न जाने कितनी बार बड़े बेटे ने कहा मुम्बई आने के लिए , लेकिन लेकिन अवस्थी जी गाँव की ममता त्याग न सके। लेकिन जब उनकी पत्नी ने भी दुनिया से  विदा ली तो उनका मन खिन्न सा रहने लगा। वो घर अब उन्हें काटने को दौड़ता था और एक दिन उन्होंने निर्णय ले ही लिया कि अब वह मुंबई जायेंगे और बेटे- बहू के साथ  ही बाकी ज़िन्दगी बिता देंगे।

उन्होंने सतीश को फ़ोन  कर दिया कि वह दो दिन बाद मुंबई आ रहे है। सतीश उन्हें स्टेशन लेने आता है और घर पहुँचकर घर दिखाकर बोला 'पिताजी ये है मेरा घर , आइए पूरा घर दिखलाता हूँ ' अवस्थी जी घर की सज -सज्जा देखकर मंत्र-मुग्ध  हो गये. उन्हें खुद पर और बेटे पर गर्व हुआ। आखिर इतनी मेहनत से इंजीनियरिंग की पढाई की और अच्छी नौकरी पायी  तभी तो मुंबई जैसे महानगर में अपना घर बना पाया।

अवस्थी जी को अपना जीवन सफल लग रहा था। जीवन भर की पूँजी उन्होंने सतीश के लिए ही तो खर्च की थी , और आज उसकी उन्नति देखकर वह गर्व से फूले नहीं समा रहे थे। सतीश ने कहा 'पिताजी यह हॉल है ,यहाँ लोग बैठते है और बगल में मेरा और आपकी बहू का कमरा है , उनके बगल में आपके पोते का कमरा है ' ' पर बेटा , वह  तो अभी बहुत छोटा है ,वह तुम लोग अपने   साथ नहीं सुलाते ?' ' पिताजी यहाँ ऐसा ही होता है , बच्चे अलग ही सोते है 'अवस्थी जी को अचानक याद आया कि कैसे १२ वी तक तक सतीश उनके साथ सोता था, समय पर सोना जागना , तभी तो काबिल बना उन्हें कुछ अच्छा नहीं लगा पर बेटे को  उन्होंने कुछ नही कहा  वह चुपचाप आगे  बढ़े। सतीश बोला 'पिताजी बगल के कमरे के बाद बगल से सीढियाँ है ,ऊपर जाने के लिए, ऊपर आइए "

सतीश ने ऊपर कमरा दिखाते हुए कहा 'पिताजी यह एक पालतू कुत्ते का कमरा है ' ' और बगल वाला ?' अवस्थी जी ने पूछा , क्योंकि वह कमरा टीन शेड वाला था। 'पिताजी यह कबाड़घर है , यहाँ हम फालतू चीजें रखते है। अवस्थी जे ने पूँछा , 'बेटा  ये चारपाई , यहाँ कौन सोता है? ' ' सोता नहीं है पिताजी , अब आप सोयेंगे, क्योंकि यही एक कमरा है जो खाली है  'यह कहकर सतीश ने उनका सामान बिस्तर पर रख दिया। ' आप आराम करिये , मैं चाय लाता हूँ.

अवस्थी जी तो जैसे स्तब्ध रह गये। कबाड़घर में  जगह  ! इसी दिन के लिए उन्होंने इतनी ,मेहनत की।  उन्हें ऐसा लग रहा था कि बस अभी चले जाय । पर उन्होंने खुद को संभाला , रात को सबके सोने के बाद अवस्थी जी ने कुर्ते की जेब में टटोलते हुए ,गाँव वाले घर की चाभियाँ निकाली और खुद से कहा ' मैं कबाड़ नहीं हूँ  मेरा घर है, मेरी मेहनत का अब यहाँ नहीं रहना ' उन्होंने चुपचाप अपना सामान उठाया और गेट खोलकर चले गये। सुबह सतीश चाय लेकर ऊपर गया तो पिताजी को ना  पाकर आवाज लगायी , हर जगह देख लिया पर वह कही नहीं मिले।

शोर सुनकर सतीश की बीवी बोली, ' क्या है? , क्यों शोर मचा रहे हो सुबह -सुबह? '  ' पिताजी नहीं मिल रहे बच्चे है क्या? इधर -उधर कही गये होंगे, आ जायेंगे सुबह -सुबह नींद ख़राब कर दी 'पर काफी देर बाद भी पिताजी घर नहीं आये। अंत में पांच वर्षीय करन ने पिता के हाथ  में एक कागज़ का टुकड़ा देते हुए कहा 'पापा ये दादू के पलंग पर था ' सतीश ने कागज़ को खोलकर देखा , जिसपर अवस्थी जी ने लिखा था

 

 

  प्रिय बेटे ,

तुम्हारी उन्नति देखकर ख़ुशी हुई , साथ ही अपने संस्कारों पर शर्म भी आयी , क्या ऐसे ही संस्कार दिए थे तुम्हे?' मै एक  शिक्षक  हूँ , बहुतो को बनाया है आगे भी बनाउँगा। आज से पूरे गांव  के  बच्चे मेरे बच्चे है। मेरे अपने घर जा रहा हूँ , जिसे मैंने बनाया है, जहाँ हर जगह मेरी है।  मैं कबाड़ नहीं था जो कबाड़ख़ाने में रहूँ।  हमेशा ख़ुश रहना और मुझसे कोई संबंध न रखना '

  

            तुम्हारा वो पिता जिसे तुम पिता कहने का भी हक़ खो चुके हो।

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