कीमत

 

घर में बड़ी चहल-पहल थी। पूरा घर रोशनी से नहा रहा था। फूलों की महक मन को खुश कर रही थी। उस पर लॉन में बजता संगीत, कुल मिलाकर किसी अलग ही लोक में ले जा रहे थे, यानी स्वप्नलोक, मौका  अनुभा की बर्थडे पार्टी का था अनुभा भी किसी परी से कम नहीं लग रही थी।

केक काटने के समय सबने उसे एक से बढ़कर एक उपहार दिए जो बेशकीमती थे। आखिर शहर के धनाढ्य लोगों का जमावड़ा जो था वहाँ।

पार्टी में अनुभा की कामवाली भी थी , जो लोगो का ख्याल रखने के लिए वहाँ थी। केक काटते समय वह भी वहाँ ख़ुशी -ख़ुशी आई और चहकते हुए उन बड़े बड़े उपहारों के बीच एक छोटा सा उपहार अनुभा को देते हुए बोली 'दीदी मैं भी आपके लिए कुछ लायी हूँ। ' यह कहकर उसने अनुभा को उपहार पकड़ा दिया। और अनुभा  चाहते हुए भी उसका उपहार रख  लेती है।

पार्टी ख़त्म होने पर  सारे  गिफ्ट कमरे में लाये जाते है। और अनुभा ने सबको संभाल कर रखते हुए कामवाली  के उपहार को   डस्टबिन में डाल दिया। अगले दिन कामवाली सफ़ाई के दौरान अपना गिफ्ट डस्टबिन में  देखकर बहुत  दुखी हुई और रोने लगी तभी अनुभा का पति गौरव वहाँ आता है और उसे रोता  देखकर कारण पूछा। कामवाली ने  रोते -रोते सारी बात गौरव को बताई। गौरव उसे ढाढ़स बंधाते  हुए बोला ,' लो ये शर्ट रख लो 'और जब अनुभा तुमसे पूछें यह तुम्हे किसने दिया तुम  मेरा नाम बता देना,  उसे दिखाना जरूर '   कामवाली के हाथ में शर्ट देखकर अनुभा गुस्से से तिलमिला गई और पूछा 'ये तुम्हे किसने दी ? चुराई है ?'  'नहीं मैडम ये तो  साहब ने मुझे दी।  अब तो अनुभा का गुस्सा सातवें आसमान पर था। वह शर्ट लेकर गौरव के पास  पहुँची  और गुस्से मे  बोली ' गौरव मैंने कितने प्यार से ये शर्ट तुम्हे गिफ्ट की , और तुमने उसे कामवाली को दे दिया ?'

गौरव मुस्कराते हुए बोला 'शर्ट ही तो है , मेरे पास कितनी है एक दे दी उसके  पति को   इसमें क्या हुआ ? पर तुम्हे मेरी गिफ्ट की हुई शर्ट ही देनी थी ? मेरी भावनाओं की तुम्हे कोई परवाह नहीं ? कितने प्यार से लाई थी तुम्हारे लिए '

'प्यार से तो कामवाली ने भी तुम्हें गिफ़्ट दिया था पर तुमने कीमत के हिसाब से उसे फेंक दिया। यानि उपहार नहीं कीमत मायने रखती है तुम्हारे लिए भावना नहीं   ऐसा ही तो मैंने भी किया फिर इतना गुस्सा क्यों ? फिर मैंने तो शर्ट को फेका भी  नहीं '

अनुभा को अब समझ चुका  था। गौरव उसे क्या समझाना चाहता था। उसने गौरव से माफ़ी माँगी। बोली 'मुझे माफ़ कर दो , पैसे के घमंड में मैंने वाकई गलत किया। यह भी ना सोचा की कामवाली को भी दुःख होगा। गौरव ने मुस्कराते हुए कहा 'चलो तुम समझ तो गई अब माफ़ी मुझसे नहीं कामवाली से मांगो। तकलीफ़ तो उसे हुई है' अनुभा ने कामवाली से अपनी गलती स्वीकार करते हुए कहा 'प्लीज मुझे माफ़ कर दो , मैने गलत किया , अब तो मैंने तुम्हारे गिफ्ट को फेंक दिया ,नहीं तो मैं उसे बेडरूम  में रखती।

अनुभा का यह रूप देखकर कामवाली खुश होते हुए बोली 'मैडम माफ़ी ना मांगे , वह उपहार मैंने अभी भी रखा है, अगर आप उसे ले ले तो मुझे ख़ुशी होगी। 'सच! अनुभा ख़ुशी से बोली 'कहा है ?”दो मुझे ,  तुम्हारा दिल बहुत बड़ा है और तुम्हारा उपहार भी  बहुत कीमती  है मेरे लिए  उसकी वजह से मुझे मेरी  गलती का एहसास हुआदूर  खड़ा गौरव अपनी योजना की कामयाबी पर मुस्कुरा रहा था।  

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