बड़ा बेटा

 


 

ऑफिस में हमेशा इस बात की चर्चा रहती थी कि रमेश है तो चपरासी लेकिन बहुत बन-ठन के  आता है, और कहने पर भी किसी के साथ लंच नहीं करता। लगता है तनख्वाह के सरे पैसे खुद पर ही खर्च कर देता है। तभी तो इतने अच्छे कपडे और खाना खाता है।

पर सबके मन में जानने की बड़ी उत्सुकता थी कि आखिर वो ऐसा क्या खाता होगा जो हम सबसे छुप कर खाता है और अच्छे से अच्छा खाना भी मनाकर खुद का ही खाना खाता है, वो भी अकेले में। कई बार लोग उसकी खिंचाई भी कर देते थे पर वह कुछ नहीं बोलता था। नमिता को यह सब जरा भी पसंद नहीं था। वह हमेशा कहती कि हमें किसी की पर्सनल लाइफ में झांकने का हक़ नहीं है पर बाकी लोग बाज नहीं आते थे।

ऑफिस के बड़े बाबू विनय ने मैनजेर शर्मा जी से इस बात का जिक्र किया फिर सबने योजना बनाई  कि  वह छुपकर पता लगाएगा कि आखिर रमेश ऐसा व्यहार क्यों करता है?

एक दिन लंच टाइम में सारे  लोग चुपचाप उस जगह  पहुँचे।  जहा रमेश बस अपना डिब्बा बस खोलने ही वाला था। सबको अचानक देखकर उसने कहा 'अगर कोई काम था तो मुझे बुला लिया होता , आप सबने ये तकलीफ क्यों की ?''अरे भाई हम सबने सोचा कि क्यों ना आज  लंच तुम्हारे साथ करें क्योकि तुम तो हमारे साथ खाओगे   नहीं तो हम ही  तुम्हारे साथ खा लें। अपना टिफिन खोलो ' यह कहकर सभी वहाँ बैठ जाते है और अपना लंच बॉक्स खोलते है। केबिन में खाने की खुशबू फ़ैल जाती है। 'अरे तुमने अब तक  टिफिन नहीं खोला 'अरे हम सबसे से इतना भी क्या छुपाना , लाओ भाई हम ही खोल देते है 'कह कर विनय हँसते हुए रमेश का टिफिन खोल देता है। उसके बाद तो सब जैसे सन्न रह जाते है। टिफिन में सूखी रोटी और प्याज के दो टुकड़े पड़े  थे बस।  '

अरे रमेश डाइटिंग पर हो क्या ?' विनय ने पूँछा।  अब रमेश के सब्र  का पैमाना छलक चुका था। आँखों में आँसू गये  थे।  खुद को सँभालते हुए वह बोला 'नहीं साहब ये मेरा रोज का खाना है ' ' पर  क्यों ? १५००० की तनख्वाह है तुम्हारी उसमे इंसान ठीक से तो खा ही सकता है ' विनय बोला , मैनेजर भी बोले 'हाँ रमेश ऐसे क्यों रहते हो ?

'आँखों में आँसू  लिए रमेश बोला 'साहब इसलिए ही आपके सब के साथ लंच नहीं  करता था , जी १५००० तन्खवाह है पर १०००० घर भेज देता हूँ क्योकि दो बहने पढाई करती है ,घर खर्च माँ की दवाई , घर का मैं ही बेटा हूँ, बड़ा बेटा , इसलिए सब मेरी जिम्मेदारी मेरी बनती है बाकि बचे ५००० में २००० रूम का किराया , १००० में एक तरफ ऑफिस का किराया ,२००० में खाना  जो की इससे अच्छा नहीं हो सकता' ' पर जब हम तुम्हे अपना खाना देते थे तो वह क्यों नहीं कहते थे? ' नमिता ने   पूछा ' मैडम , मुझे किसी की सहानभूति या दया नहीं चाहिए , स्थितियाँ मेरी है , एक दिन ठीक हो सकती है , इनसे लड़ना ही होगा मुझे मन को भटकाने से क्या फायदा 'रमेश बोला

'पर तुम्हारे कपड़े इतने मेन्टेन कैसे रहते है और दो ही कपडे क्यों पहनते हो 'विनय बोला ' साहब कुल तीन सेट कपड़े है मेरे पास, एक आकस्मिक परिस्थति के लिए दो रोज के लिए ,इसलिए इन्हे अच्छे से रख लेता हूँ , रोज धो कर सूखने के बाद बिस्तर के नीचे  रख देता हूँ जिससे सिलवटे चली जाती है।

सब के सब निस्तब्ध हो गये । किसी को समझ नहीं आ रहा था कि अब क्या बोले। बेवजह मजाक-मजाक में वे किसी के दुःख का कारण बने।

ख़ामोशी को तोड़ते हुए नमिता बोली 'रमेश हमें माफ़ कर दो , हमारा इरादा तुम्हे दुःख पहुँचाने  का नहीं था।  मैनजेर भी बोला ' रमेश हम शर्मिंदा है , अनजाने में हमने तुम्हारे  व्यक्तिगत जीवन में  बेकार झाँकने  की कोशिश की'

' नहीं साहब ये तो सच है जो आप सबने  देखा   फिर माफ़ी क्यों माँगना ?' ' नहीं हमें माफ़ कर दो ' सब एक साथ बोल पड़े। रमेश ने आँसू पोंछते हुए कहा कि 'अरे आप सब मुझसे बड़े है , माफ़ी माँगकर शर्मिंदा ना करें , फिर भी आप की ख़ुशी के लिए मैं आपको माफ़ करता हूँ''

'सच' नमिता बोली 'हम ऐसे नहीं मानेंगे अगर तुमने हमे सच में  माफ़ कर दिया तो आज हमारे साथ लंच करो और आज नहीं रोज तुम हमारे साथ ही लंच करोगे।  अभी तुमने कहा था कि हम सब तुमसे बड़े है इसलिए तुम्हे हमारी बात माननी पड़ेगी '

'पर ..... ' ' पर वर कुछ नहीं आओ बैठो हमारे साथ कहकर सब वही बैठ जाते है और लंच करते है

नमिता विनय से कहती है 'सच  है हमारा समाज बेटियों के योगदान को तो अब मानने लगा है पर  घर  के बड़े बेटे जिनके माँ -बाप सच में संपन्न नहीं है वो अब  भी नींव में पत्थर की तरह ज़मीन में चुपचाप पड़े रहते है अच्छी बेटी होना महान  है पर अच्छा बेटा होना वो भी बड़ा बेटा होना आसान नहीं है '

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