मुकद्दर की इबारत

 


​शहर की भागदौड़ से दूर, एक पुराने कमरे की खिड़की पर बैठी वह अक्सर आसमान को देखा करती थी। बचपन की यादें आज फिर उसकी पलकों पर आ ठहरी थीं। उसे याद था वह दौर, जब घर में तंगहाली थी, गरीबी का साया था, लेकिन उसकी आँखों में पढ़ाई-लिखाई करके कुछ बड़ा बनने की एक बेफ़िक्र चमक थी। वह मुश्किलों से डरती नहीं थी, बल्कि अपनी मासूमियत और हँसी से हर दिन को नया बना लेती थी।

​ग्रेजुएशन का आख़िरी साल था, उम्मीदों के नए पंख निकल ही रहे थे कि नियति ने पहला वार किया। पिता का साया हमेशा के लिए सर से उठ गया।

​जिस उम्र में लड़कियाँ अपने सपनो को बुनती हैं, उस उम्र में उसके कंधों पर पूरे परिवार का बोझ आ गिरा। लेकिन वह बिखरी नहीं। उसने आँसू पोंछे, छोटी-मोटी नौकरी ढूँढ़ी, परिवार का पालन-पोषण किया और अपनी आगे की पढ़ाई भी जारी रखी। उस भागदौड़ भरी ज़िंदगी में भी उसने जीने का हुनर ढूँढ़ लिया था। उसे घूमना, तस्वीरें खींचना, और दुनिया को कैमरे के लेंस से देखना बहुत पसंद था। वही उसकी छोटी सी आज़ादी थी, वही उसकी अपनी दुनिया थी।

​पर शायद इम्तिहान अभी बाकी थे। नियति ने फिर एक मोड़ लिया और माँ के साथ हुई एक भयानक दुर्घटना ने बचा-खुचा सुकून भी छीन लिया।

​अब ज़िम्मेदारियाँ दोगुनी हो चुकी थीं। बेफ़िक्री का आखिरी तिनका भी हवा में उड़ गया। शादी-ब्याह की उम्र निकलती गई, भाई-बहनों की अपनी खींचतान और घर के संघर्षों के बीच वह धीरे-धीरे अकेली पड़ती गई। जैसे-जैसे उसने मुश्किलों से 'झेल जाना' और 'चुप रहना' सीखा, वैसे-वैसे उसकी बेग़रज़ हँसी, उसकी मासूमियत और उसके चेहरे की वो पुरानी ख़ूबसूरती ख़ामोशी के पीछे छिप गई। वह मुस्कुराना भूल गई।

​कभी-कभी जब रात ढलती, तो उसे लगता कि संघर्षों की इस धूप में उसका अपना अस्तित्व कहीं खो गया है। उसे अपना ही बचपन याद आता और मन में एक गहरा सन्नाटा पसार जाता।

​लेकिन... इस सारे अंधेरे के बावजूद, उसके भीतर एक छोटी सी लौ हमेशा जलती रही।

​वह टूटी ज़रूर थी, पर हारी नहीं थी। उसने महसूस किया कि भले ही ज़माने ने उससे उसकी हँसी छीन ली हो, लेकिन उसके नाज़ुक हाथों में मौजूद कलम और उसके दिल की गहराई को कोई नहीं छीन सकता। उसके पास अपनी भावनाओं को शब्दों में पिरोने का हुनर था।

​उसकी कलम में सच्चाई का वो जादू था जो सीधे दिलों को छू लेता था। धीरे-धीरे उसने अपनी रचनाओं और अपनी पुरानी फोटोग्राफी की कला को दुनिया के सामने साझा करना शुरू किया।

​और फिर, उसकी मेहनत और सब्र रंग लाई उसकी लिखी एक कहानी को एक प्रतिष्ठित साहित्यिक प्रतियोगिता में पहला स्थान मिला। जब मंच पर उसका नाम पुकारा गया, तो वह केवल उसकी जीत नहीं थी, बल्कि उसके सालों के संघर्ष का जवाब ईनाम था।

   उसकी लिखी ग़ज़लों और कविताओं का संग्रह 'उम्मीद का चिराग' नाम से पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुआ। देखते ही देखते उसकी किताब पाठकों के दिलों में बस गई और वह एक चर्चित और सम्मानित लेखिका बन गई।  अपनी लेखनी और फोटोग्राफी के दम पर उसने न केवल अपने परिवार को हर तंगहाली से बाहर निकाला, बल्कि अपने भाई-बहनों को उनके पैरों पर खड़ा किया। अब लोग उसे एक 'बेबस लड़की' के रूप में नहीं, बल्कि एक सफल, आत्मनिर्भर और प्रेरणादायक महिला के रूप में पहचानते थे  जिस फोटोग्राफी के शौक को उसने जिम्मेदारियों के तले दबा दिया था, अब उसी फोटोग्राफी के जरिए उसने अपनी पहली एकल प्रदर्शनी  आयोजित की, जहाँ उसकी खींची तस्वीरों ने कई लोगों का दिल जीत लिया।

​आज जब वह पीछे मुड़कर देखती है, तो उसके चेहरे पर वो खोई हुई मासूमियत और हँसी वापस लौट आई है—लेकिन इस बार उसमें एक आत्मनिर्भर स्त्री का गर्व और गरिमा भी शामिल है।

​उसने साबित कर दिखाया कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, अगर दिल में 'उम्मीद का चिराग' जलता रहे, तो इंसान अपने मुक़द्दर की इबारत खुद लिख सकता है।



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