पहला प्यार
तुम जब भी यहाँ आती हो तो रुक क्यों जाती हो भला? क्या है ऐसा यहाँ?" रीमा की आवाज़ ने जैसे मुझे सपने से जगा दिया। और वह सही भी कह रही थी। मैं जब भी कैंटोनमेंट एरिया से गुज़रती थी, मुझे न जाने क्या हो जाता था। मेरे घर में दूर-दूर तक कोई आर्मी वाला नहीं था, लेकिन आर्मी की यूनिफॉर्म और उनका अनुशासन मुझे खींचता था। वह सभी आर्मी वाले मुझे अपने से लगते थे।उनके प्रति एक अनजाना सा जुड़ाव महसूस करती थी। उनसे जुड़ी कोई भी फिल्म न थी जो मैंने न देखी हो। 26 जनवरी 15 अगस्त की परेड टीवी पर उन्हें देखना मेरा पसंदीदा काम था।
एक दिन मेरे सर ने मुझे बताया कि आर्मी स्कूल में कोई वैकेंसी आई है। मैंने न आव देखा न ताव, बस तुरंत ही जाकर फॉर्म अप्लाई कर दिया। एक दिन सर की कॉल आई उन्होंने मुझसे कहा "तुम कहा हो "? मैने कहा " घर पर" " अरे आज तो आर्मी स्कूल का इंटरव्यू है , तुम गई नहीं?" " मुझे तो कोई कॉल नहीं आई" । " सर ने कहा " तुम तुरंत जाओ और वहां पता करो क्या हुआ?" आनन फानन में मैं वहां पहुंची। पहुंचते ही मैने ऑफिस में जाकर पूछा तो ऑफिस इंचार्ज ने बताया कि मेरा कोई आवेदन नहीं मिला। तब मेरा गुस्सा बढ़ गया—पर खुद को संभालते हुए मैंने बोला ही दिया कि" मैंने तो सुना है आर्मी वाले बड़े अनुशासित और व्यवस्थित होते हैं, पर यहाँ तो अनुशासन ही नहीं" मुझे गुस्से में देखकर उन्होंने कहा "मैडम आप शांत हो जाइये, मैं देखता हूँ।"
कुछ देर बाद ऑफिस में वो मेजर त्यागी के साथ जो इंटरव्यू बोर्ड में भी थे वापस आए ।त्यागी जी ने बहुत ही विनम्रता से समझाया और कहा कि " आप परेशान न हो । एप्लिकेशन शायद कहीं मिस हो गया होगा ,मैं आपसे माफ़ी चाहता हूँ, आप इंटरव्यू दे दीजिये " । उनकी विनम्रता ने मुझे बहुत प्रभावित किया। साथ ही उनका व्यक्तित्व देखकर मैं जैसे सम्मोहित सी हो गई थी। उस पर आर्मी की यूनिफॉर्म सोने पे सुहागा। लड़की होकर भी मेरी नजरें उन पर से हट नहीं पा रही थीं। उन्होंने बहुत आदर के साथ इंटरव्यू की जगह तक मुझे ले गये।
मैने अभी-अभी जॉब शुरू ही किया था। अनुभव भी नहीं था। बड़ा सा हाल रास्ते में यूनिफॉर्म वाले चारो तरफ थे। मेज-कुर्सी के चारो तरफ टेबल-यूनिफॉर्म वाले लोग के लिए तो लग रहा था जैसे मैं किसी सपना देख रही थी। डर भी लग रहा था पर मैंने सभी प्रश्नों के उत्तर ठीक-ठाक दिए। मुझे लगा कि मेरा चयन हो जाएगा ।दिन बीतते गये पर कोई फोन कॉल नहीं आया। मेरी आशा निराशा में बदल गई थी। मैं इस बात को भूल ही गई थी। बस एक हल्की सी याद मेरे दिमाग में थी जो वह त्यागी जी की याद थी। दिन बीतते गये। करीब 6 महीने बाद मेरे पास एक कॉल आया। फोन उठाया तो उधर से आवाज़ आई "हेलो, मैं मेजर त्यागी आर्मी स्कूल से बोल रहा हूँ"। उन्होंने कहा आपने यहां जॉब के लिए अप्लाई किया था क्या आप अभी भी इंटरेस्टेड हैं?उनकी आवाज़ सुनकर मुझे कुछ पल को यकीन नहीं हुआ। मैं स्तब्ध रह गई थी। उधर से फिर से आवाज़ आई "हेलो-क्या आप मुझे सुन पा रही हैं?"। "जी मैं सुन रही हूँ, मैं इंटरेस्टेड हूँ, बताइये क्या करना है?"। "आप कल 11 बजे ऑफिस आएं, मुझसे मिलें"। कह कर मैंने फोन रख दिया। अगले दिन सुबह मैं तैयार होकर आर्मी स्कूल पहुँच गई। रास्ते में संशय भी था और खुशी भी। संशय इसलिए कि इस बार क्या होगा? खुशी मेजर त्यागी की एक झलक देखने की।
पता पूछकर मेजर त्यागी के ऑफिस पहुँच गयी। अभिवादन के बाद उन्होंने जैसे ही मुझसे जॉब की बात की मै तुरंत बोल पड़ी " सर पिछली बार मुझे बताया तक नहीं गया इसलिए पता नहीं इस बार भी क्या होगा? वो तो आपने मुझे काल किया तो मैं आ गई बस आपको देखने के लिए" कहकर मैं जैसे रुक सी गई। मैंने उनकी तरफ देखा तो पाया कि मेजर त्यागी की निगाहें नीचे झुकी हुई थीं। मानो झेप गए हो गए । मुझे तुरंत अपनी गलती का अहसास हुआ । कि मैने कुछ गलत बोल दिया । मुझे अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखना चाहिए था। मैने तुरंत बात को संभालते हुए कहा कि " मतलब आप का रवैया सहयोगात्मक था इसलिए आपकी बात पर चली आई। आप मुझसे प्रॉमिस करिए कि इस बार जो भी हो आप मुझे बता देंगे"। उनके हां कहने पर मै खुशी खुशी अपने घर चली आई।
दो दिन बाद फिर स्कूल से कॉल आई की मै ज्वाइन कर सकती हूं। मेरी खुशी का ठिकाना न रहा। अच्छी सैलरी
साथ ही उन लोगों के बीच रहना जिन्हें मैं दूर से ही देखकर खुश हो जाती थी। मेरे सबसे खास बात मेजर त्यागी।
इतने बड़े लोगों के बीच सम्मान पाना खुद में चुनौती से कम नहीं था। मैं चाहती थी कि सभी मुझे मेरे काम से पहचानें। इसलिए मैंने दिल जान दोनों लगा कर अपनी नौकरी की। उन फौजियों के बीच मैं भी खुद को फौजी जैसा ही महसूस कर रही थी।
फौजी लोगों के बच्चों को पढ़ाना मेरे लिए सेवा जैसा ही था। धीरे-धीरे मेरे काम ने मुझे पहचान दी। मुझे सराहना मिलने लगी थी। एक दिन जब मेजर त्यागी ने मुझे मेरे काम के लिए सराहा तो जैसे मेरे कदम ही ज़मीन पर नहीं पड़े। हर रोज घर आने से पहले उनसे मुलाकात हो ही जाती थीऔर वो पल मेरे लिए सबसे अनमोल पल होते थे, चाहे बात कुछ भी न हो, उन्हें देखना होता था। मेरी सुकून की सबसे बड़ी वजह थे वो। इसी बीच मेरे घर पर शादी की बात हुई। लड़के वाले मुझे देखने आये और पसंद भी कर लिया। पर मेरे दिमाग पर मेजर त्यागी छाये हुए थे। कोई रिश्ता हमारे बीच नहीं था पर शायद जैसे मन से मैं उनकी हो चुकी थी। बिना ये जाने-समझे कि वह मेरे लिए क्या सोचते हैं?ये तो मेरी अपने ख्यालात थे और सच्चाई ये थी कि मेरे पास कोई बात ही नहीं थी जो मैं अपने घर वालों को बोल सकूं । लिहाज़ा रिश्ता तय हो गया। सगाई भी हो गयी। इन सब में एक हफ़्ते का समय निकल गया। एक हफ़्ते बाद जब स्कूल पहुंची तो सगाई की बात सुनकर सबने बधाई दी। और मेजर त्यागी ने भी पर आज पहली बार उनकी आँखों में मुझे उदासी दिखी पर पूछने की हिम्मत न थी। दो महीने बाद मेरी शादी होने वाली थी पर मेरे मन में कोई खुशी नहीं थी। जैसे जड़ सी गई थी। मैं खुद समझ नहीं पा रही थी कि मैं ये शादी क्यों कर रही हूं जब मन से तैयार नहीं? पर जवाब कोई नहीं।
दिन धीरे धीरे बीत रहे थे। दो महीने बीत चुके थे अब बस एक महीना बाकी था मेरी शादी को। ससुराल से रोज कोई हिदायत, मांग आती रही थी। मैं जैसे मेरा वजूद ही नहीं था। एक दिन होने वाले देवर से मेरी बहस हो गयी। फोन पर उसने संस्कारो का ज्ञान पढ़ना शुरू कर दिया साथ ही शादी के लिए तरह तरह की शर्ते और मांग फिर अचानक 5 लाख की मांग आ गयी। घर में छोटी बहन भी थी और सारी बातें पहले ही बताई जा चुकी थी फिर भी इस तरह की मांग, होने वाला पति बातें तो बड़ी मीठी करता था इन सब बातों पर खामोश । यानी गलत को गलत कहने की हिम्मत भी नहीं उल्टा मेरे परिवार पर ही दोषारोपण। मेरा जैसे दम ही घुट गया हो और एक दिन मैने संकोच छोड़ सगाई तोड़ दी। सबने मेरा विरोध किया, पर मै जानती थी मैने या किया? और मुझे इसका कोई पछतावा भी नहीं था।लेकिन इन सब का असर मेरे चेहरे , स्वास्थ्य सब पर दिख रहा था । स्कूल में सबको मेरे सगाई टूटने की बात पता चली। सब ने अफसोस किया सिवाय त्यागी सर के। उन्होंने मुझे ढांढस बंधाते हुए कहा कि "हर मोर्चे पर सही निर्णय ही फौजियों का काम है तभी जंग जीती जाती है तुमने भी ऐसा ही किया जो इंसान तुम्हारी भावनाओं और परिस्थिति को न समझ पाए वह कही से तुम्हारा होने लायक नहीं" उनकी इस बात को सुन मेरा सब्र का बांध जैसे टूट गया। मन कर रहा था उनके कंधे पर सिर रखकर जी भरकर रो लूं। लेकिन फिर वही बात ये मेरी सोच थी । मैने खुद को संभाला लेकिन इस परिस्थिति में हमेशा मन उदास रहने लगा।
एक दिन स्कूल की तरफ बच्चों के लिए मनाली ट्रिप का प्रोग्राम बना।मेरे साथ एक और टीचर भी थे साथ ही सेना के दो लोग जिनमें मेजर त्यागी भी थे । मेरा मन तो नहीं था पर त्यागी सर की वजह से मना नहीं कर पाई।
रास्ते में मेरी तबियत खराब हो गई इसलिए वहां पहुंचते ही सब घूमने निकल गए और मैं होटल में आराम करने लगी। मुझे बहुत ठंड लग रही थी। साथ में उल्टी सिरदर्द भी। पहाड़ों की ठंड शायद मुझे रास न आई।
शाम को सब मेरे कमरे में हालचाल जानने के लिए आए थोड़ा बेहतर महसूस कर रही थी इसलिए सब के कहने पर मै भी बाहर टहलने चली गई। बच्चे सब एक साथ और हम चारों एक साथ। घूमते घूमते हम पार्क में पहुंचे जहां बच्चे खेल में व्यस्त हो गए और बाकी लोग मोबाइल में। कुछ देर बाद त्यागी सर मेरे पास आए और बोले " तुम देखने से तो स्ट्रांग लगती हो पर हो बहुत कमजोर"। यह हमारी पहली अनौपचारिक बात थी। मैने कहा " सर स्थितियां इंसान को कमजोर बना देती है"। " ऐसा क्या हुआ मानता हूं पिछले दिनों तुमने एक रिश्ते को टूटते देखा पर वह जीवन का अंत तो नहीं। बहुत से मौके आयेंगे"। " सर आप नहीं समझते कि जब किसी को पागलों की तरह पसंद करते हो और सामने कोई और फिर भी रिजेक्शन, दबाव तो कैसा लगता है?"। झल्लाहट में मेरे मुंह से अनायास ही निकल गया। फिर मैं संकोच में पड़ गई। मेजर त्यागी ने एक प्रश्नवाचक दृष्टि मेरे ऊपर डालते हुए कहा " अगर तुम्हे कोई पसंद है तो कहा क्यों नहीं?" " कैसे कहती सर? मेरी हिम्मत नहीं" "प्यार भी करती हो और डरती भी हो मुझे बताओ मै तुम्हारी बात करवा दूंगा"। " सर आप तो जानते हैं आर्मी वाले मुझे पसंद है"। " क्या हमारे ऑफिस में तुम्हे कोई पसंद है?" अब तो मेरे सब्र का बांध टूट गया और मुझसे न रहा गया, " कोई नहीं सर मुझे आप पसंद है पर मै कैसे कहूं"? मेरी बात सुनकर वह खामोश हो गए। कुछ देर बाद बोले " पसंद तो तुम्हे मै भी करता हूं, तुम्हारा बचपना, तुम्हारा बेबाक अंदाज सब मुझे बहुत पसंद है पर मै आर्मी के अनुशासन से बंधा हूं इसलिए कुछ नहीं कहा"। " सच" खुशी के मारे मै चिल्ला सी उठी। अगर उसी समय मेरी मौत भी हो जाती तो मुझे दुख नहीं होता। आज जैसे मुझे सब कुछ मिल गया हो। " मै तुम्हारे पिता जी से मिलना चाहता हूं"। उन्होंने कहा तब तक और लोग भी आ गए और हम दोनों चुप होकर अपने कमरे में चले गए। घर आकर मैने सारी बातें अपनी मां को बताई। मां ने पहले तो आनाकानी की लेकिन मेजर त्यागी की तस्वीर देखकर वह मन न कर सकी।
मेजर त्यागी ने बड़े ही सहज अंदाज में मेरे पिता से मेरा हाथ मांगा। मेरी तरह मेरे पिता भी आर्मी वालो का बहुत सम्मान करते थे उन्होंने हां कर दिया और मैं मिस से मिसेज त्यागी बन गई। हमारे ऑफिस में सबने हमारी शादी के बाद एक पार्टी रखी और हमें हमारे नए जीवन के लिए शुभकामना दी।
दिन ऐसे बीत रहे थे मिनट सब कुछ बहुत अच्छा था किसी सपने जैसा। हमारी शादी को दो साल हो गए पर पता ही नहीं चला । एक दिन मेजर साहब को किसी जरूरी मिशन के लिए पंजाब बुलाया गया। जहां से वह लौटकर नहीं आए आई तो बस एक खबर " अपने साथियों को बचाने के लिए मेजर अमित त्यागी का बलिदान"।
साथियों को बचाने में विजय भी मिली सभी लौट आए बस कोई नहीं आया तो वह जिसके बिना मै कुछ भी नहीं। महीनों मै बेसुध सी रहती और मेजर साहब की यूनिफार्म मेरे सीने से लगी होती। दिन रात का कुछ पता नहीं। एक साल बाद मैने फिर स्कूल ज्वाइन किया। सब ने कहा दोबारा शादी कर लो मगर मेरे लिए अब इस शब्द की कोई मायने ही नहीं थे। आफिस जाते ही एक एक कर के पुरानी यादें और भी बेचैन कर देती और एक दिन मैने वह निर्णय लिया सभी हैरान थे। मैने मेजर साहब के सीनियर ब्रिगेडियर साहब को अपने मन की बात बताई तो उन्होंने मुझे सैल्यूट किया और कहा " राह कठिन तो है पर जहां चाह वहां राह तुम कोशिश करो हम साथ है"।
उनके इस वाक्य ने मन को साहस दिया और सबके सहयोग से दो साल की कड़ी मेहनत के बाद मेरा पहला प्यार मेरे साथ था यानी कि अब मैं भी सेना का हिस्सा थी लेफ्टिनेंट अदिति त्यागी और मेरा पहला प्यार यानि कि आर्मी की वह यूनिफार्म जिस में लोगों को देखने के लिए मैं ठहर जाती थी वह यूनिफार्म जिसमें मेजर साहब को मैने जीवन साथी के रूप में चुना और आज जब मेजर साहब हमारे साथ नहीं है तो उनका अहसास इस यूनिफार्म के रूप में हमेशा मेरे साथ है।
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