मदद
कड़ाके की ठंड रात के 12:00 बजे थे तभी दरवाजे की बेल बजती है । अनुभा चहकते हुए कहती है" लगता है खाना आ गया प्लीज जाकर देख लेना "अनुभा का पति राजीव जो अब तक फाइलो में उलझा था गुस्से से बोल " आज खाना भी नहीं बनाया और देखना भी मुझे ही पड़ेगा?" " प्लीज चले जाओ ना ठंड से हाल बुरा है नहीं तो चली जाती "अनुभा के मिन्नतों के बाद राजीव सीढ़ियों से उतरकर गेट खोलता है सामने डिलीवरी बॉय ने उसे थोड़ा जल्दी पैसे देने का अनुरोध किया वह ठंड से पूरी तरह कांप रहा था। कपकपाते स्वर में वह बोला" सर थोड़ा गर्म पानी मिल सकता है क्या ?" "क्यों नहीं ?"ऊपर वाला राजीव जो गुस्से में नीचे आया था डिलीवरी बॉय की दशा देखकर एकदम से सहृदय हो जाता है "तुम रुको मैं आता हूं पर एक बात बताओ इतनी ठंड में जहां लोग रजाई में भी कांप रहे हैं तुम बिना स्वेटर के क्यों हो "? "सर यह मेरी नौकरी का पहला महीना है सैलरी नहीं आई है गांव से नया-नया आया हूं जल्दी-जल्दी में कुछ सामान भूल गया जिसमें स्वेटर भी था नई नौकरी है छुट्टी मिले कि नहीं इसलिए बस काम चल रहा हूं" ...